पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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नाटकदीप का संक्षेप
वह परमात्मतत्त्व पहले भी अद्वयानन्द पूर्ण था और अब भी
है। वह कुतूहल में आकर अपनी माया के प्रताप से पहले तो जगत्
बना और फिर जीवरूप से उसी में प्रवेश कर गया। उत्तम देहों
में प्रवेश करके तो वह देवता हुआ। अधम देहों में प्रवेश करने
से उसमें मर्त्यपन आ गया। जब उसने अनेक जन्मों तक अपने
कर्म ब्रह्मार्पण करने शुरू किये तब उसमें फिर आत्मस्वरूप का
विचार करने की शक्ति जाग उठी। विचार की आंच के सामने
जब माया न ठहर सकी तब वह फिर स्वयम् अकेला का अकेला
ही रह गया। ये जगत् और जीव सब के सब पलायन कर गये।
उस अद्वितीय तत्व के सच्चे बन्ध और मोक्ष का निरूपण करने का
सामर्थ्य तो किसी में है ही नहीं। जब उस तत्व को दुःखी होने
का धोखा लग जाता है तब बस यही उस का 'सद्वयपना' और
यही उस का 'बन्ध' कहाता है। यह दुःखीपना जब हटता है
और जब स्वरूप में स्थिति मिल जाती है तब इसी को 'मोक्ष' कहने
लगते हैं। जानते हो यह बन्ध कहां से आया है? सुनो, यह बन्ध
अविचार से आया है और विचार करने से यह बन्ध खुल जायगा।
इस कारण जब तक तत्व का साक्षात्कार न हो जाय तब तक जीव
और परात्मा का विचार सदा ही करते रहना चाहिये। विचार