पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextचित्रदीप का संक्षेप ४७
खड़ा कर देती हैं। होना यह चाहिये कि तत्वज्ञान होने पर जब
हमारा मानस-संसार (या जीव का द्वैत) मर जाय या मार
दिया जाय तब हम ईश्वर के संसार को (ईश्वर के द्वैत को)
ध्यान में रखकर व्यवहार करने लगें। अर्थात् अब तक जो
कर्म हमारे संसार में आसक्ति-पूर्वक हो रहे थे, वे अब ईश्वर के
संसार में अनासक्तिपूर्वक होने लगें। यमादि का अभ्यास करने से
हमारा मानस जगत् छिपने लगेगा तथा ईश्वर का संसार हमारी
आंखों के सामने आ जायगा। यों दैवी सम्पत्ति का विकास होगा
और वह भी धीरे-धीरे हमको पूर्ण-तत्व में जाकर जब छोड़
देगा, तब अपने आप स्वाभाविक रीति से व्यवहार क्षीण होगा।
उपरति के अभ्यास से ही सच्चा व्यवहार क्षय होगा। यदि
व्यवहार क्षय करने में आसक्ति होगी तो वह भी तो व्यवहार
की तरह ही बन्धक होगी। व्यवहार का क्षय तो उपरम से होता
है ज्ञान से व्यवहार का क्षय कदापि नहीं होता। वैराग्य और
उपरम पूर्ण हों बोध रुका हो तो मोक्ष मिलने वाला नहीं है।
बोध में पूर्णता हो फिर चाहे वैराग्य और उपरम पूर्ण न भी हो
(अधूरे हों) तो भी मोक्ष अवश्य मिलेगा, परन्तु जीवन्मुक्ति
का देवदुर्लभ आनन्द नसीव नहीं होगा। ब्रह्म-लोक तक को
तृण-तुल्य समझना वैराग्य की अन्तिम सीमा है। देहात्मा की
तरह पर तत्व को आत्मा समझ लिया जाय यह बोध की अन्तिम
दशा है। सुप्ति की तरह संसार को जागरण में भी भूल जाना
उपरम की सीमा है। हमारे आत्म-चैतन्य में जो यह जगत्
रूपी चित्र माया ने बना दिया है ज्ञान की महिमा से इसकी
ओर न देखकर जब हम अपने आत्म-चैतन्य को शेष रख लेंगे
तब जगच्चित्र को देखकर भी मोह नहीं होगा।