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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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तृप्तिदीप का संक्षेप
पुरुष यदि अपने आपे को पहचान जाय कि यह तत्व मैं
हूँ ( मेरा स्वरूप यह है ) तो फिर न तो इच्छा करने की कोई
वस्तु ही रह जाती है और न कोई इच्छा करने वाला तत्व ही
शेष रहता है। यों आत्मज्ञानी को शरीर के सुखदुःखों के साथ
साथ सुखी या दुःखी होना नहीं पड़ता। इसी बात का विस्तार
पूर्वक वर्णन इस 'तृप्तिदीप' नामक प्रकरण में जीवन्मुक्त महाशयों
में रहने वाली तृप्ति को बताने के लिये किया है।
इसे समझने के लिये जीव को दो भागों पर विचार कीजिये—
एक इसका भ्रम भाग है दूसरा इसका अधिष्ठान भाग है। जब
भ्रम भाग की प्रधानता होती है और अधिष्ठान भाग दबा सा
रहता है तब तो यह 'जीव' अपने को 'संसारी' माना करता है।
जब तो भ्रम भाग को मिथ्या समझ कर उसका अनादर कर
दिया जाता है—जब भ्रम को भुला दिया जाता है और अधिष्ठान
भाग ही प्रधान बन जाता है तब यही जीव 'मैं तो चिदात्मा हूँ मैं
तो असंग हूँ' ऐसा जानने लग पड़ता है। कल्पित सर्प का वहां से
नष्ट हो जाना जैसे सत्य नहीं होता है,इसी प्रकार जीवों को होने
वाला 'मैं असंग हूँ' इत्यादि ज्ञान भी सत्य तो नहीं होता है परन्तु
जैसे कांटों से कांटों को निकाल देते हैं इसी प्रकार इन असत्य
ज्ञानों से भी असत्य संसार का नाश तो हो ही जाता है।