पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context४६ पंचदशी
ज्ञान का फल मानते हैं वे चूक करते हैं। उनकी समझ में आया
हुआ ज्ञान तो शरीर आदि को निकम्मा कर देने वाला एक
प्रकार का रोग ही है। छोड़ने की चीज़ तो संग है। व्यवहार
छोड़ने की चीज़ ही नहीं है। जिसे सुख की इच्छा हो वह संग
का परित्याग करे। व्यवहार से किसी का भी कुछ नहीं बिगड़ता।
किन्तु संग से बिगाड़ होता है। लोक में भी किसी से मनुष्य-
हत्या का व्यवहार हो जाय और उसमें उसकी सक्ति न हो तो
वह उस पाप का अपराधी नहीं होता। व्यवहार के बन्द होने
का कारण ज्ञान नहीं है। व्यवहार के चलने और बन्द होने की
बात को समझने के लिये 'वैराग्य' 'ज्ञान' तथा 'उपरम' को भले
प्रकार समझ लेना चाहिये। भोगों में दोषदर्शन से वैराग्य उत्पन्न
होता है, भोगों को त्याग देने की इच्छा, वैराग्य का स्वरूप है,
भोगों में दीनभाव न रहना वैराग्य का कार्य है। श्रवण, मनन
और निदिध्यासन करने से तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है, सत्य और
असत्य की पहचान हो जाना तत्वज्ञान का स्वरूप है, ग्रन्थि का
फिर न लगना तत्वज्ञान का कार्य है। यम (अहिंसा, सत्य,
अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय,
ईश्वरभक्ति) आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा
समाधि करते रहने से उपरम पैदा होता है, बुद्धि का रुक कर
खड़ा हो जाना उपरम का स्वरूप है, व्यवहार का घट जाना या
बन्द हो जाना यह उपरम का कार्य है, तत्वज्ञान होते ही
जो लोग जल्दबाजी में आकर बाह्य व्यवहार को बन्द कर देने
पर तुल जाते हैं, उनके मनो-व्यापार तो चलते ही हैं। यों ज़बर-
दस्ती व्यवहार को त्यागनेवाले की अन्दर अन्दर अवनति होती ही
जाती है। उसकी अतृप्त वासनायें कभी भी जाग कर उपद्रव