Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 348 of 726

Read in context
Page 348

३२८ पञ्चदशी
धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न विद्यते किञ्चित् ।
धन्योऽहं धन्योऽहं प्राप्तव्यं सर्वमद्य सम्पन्नम् ॥२९४॥
मैं धन्य हूँ, आजतो मुझे कुछ कर्तव्य ही नहीं रहा है। मैं धन्य
हूँ क्योंकि जो मुझे प्राप्तव्य था वह सब आज मिल चुका है ।
धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्तिर्मे कोपमा भवेल्लोके ।
धन्योऽहं धन्योऽहं धन्यो धन्यः पुनः पुनर्धन्यः ॥२९५॥
मैं धन्य हूँ । आज मेरे समान तृप्ति किसको है ? इससे
अधिक और क्या कहूँ ? कि मैं धन्य हूँ,मैं धन्य हूँ,मैं बार बार
धन्य हूँ [ मुझे तो अब तृष्टि ही तृष्टि दिखाई दे रही है । ]
अहो पुण्यं महो पुण्यं फलितं फलितं दृढम् ।
अस्य पुण्यस्य संपत्ते रहो वयमहो वयम् ॥२९६॥
वे मेरे अनन्त कोटि जन्मों के अनन्त पुण्य आज निश्चय
ही फलरूप में आगये । पुण्यों की इस राशि के प्रताप से आज
मैं आनन्द सागर की लहरों में हिलोरे ले रहा हूँ । आज मेरे
पुण्यों के प्रताप से वह सारा संसार मुझे संतोष ही संतोष दीख
पड़ रहा है ।
अहो शास्त्र महोशास्त्र महो गुरु रहो गुरुः ।
अहो ज्ञान महो ज्ञान महो सुखमहो सुखम् ॥२९७॥
उन शास्त्रों और उन गुरुओं को स्मरण करके भी आज
मुझे बड़ा हर्ष हो रहा है, जिनके कि प्रताप से मेरी हृदय की
ग्रन्थि खुली है । ज्ञान के प्रताप से मैं इस हर्षातिरेक में आया
हूँ और आनन्दित हो रहा हूँ उस ज्ञान और उस सुख की
महिमा का क्या वर्णन करूँ ?