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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२७
कर्तव्य नहीं है कि वह अज्ञानी प्राणी को किसी तरह बोध
करादे । [ इस कारण ज्ञानी को उनका अनुसरण करके तत्व
बोध कराना चाहिये । अज्ञानी की तरह सब कुछ करने लगना
इष्ट नहीं है । ]
कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः ।
तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥२९१॥
यह विद्वान् पहले तो कृतकृत्य हो जाने के कारण तृप्त हो
कर, फिर आगे कही विधि से प्राप्तप्राप्तव्य हो जाने के कारण
तृप्त होकर, अपने मन में सदा यही सोचा करता है—
धन्योऽहं धन्योहं नित्यं स्वात्मानमञ्जसा वेद्मि ।
धन्योहं धन्योऽहं ब्रह्मानन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥२९२॥
मैं धन्य हूँ । क्योंकि मैं अपने आत्मतत्व को साक्षात्
जान गया हूँ । यों आत्मा को समझ लेने से ही मुझे परम हर्ष
है । ब्रह्म नाम का जो आनन्द है, वह अब मुझे स्पष्ट ही प्रतीत
होने लगा है । यों आत्मज्ञान के फल के मिलने से मैं परम धन्य
होगया हूँ ।
धन्योहं धन्योहं दुःखं सांसारिकं न वीक्षेऽद्य ।
धन्योहं धन्योहं स्वस्याज्ञानं पलायितं क्वापि ॥२९३॥
आज तो मुझे कोई भी सांसारिक दुःख नहीं दीखता । इस
कारण अनिष्ट की निवृत्ति हो जाने से भी मैं धन्य हो गया हूँ ।
क्योंकि आज मेरा अज्ञान [ अनेक कर्मों की वासनाओं का
पुञ्ज ] न मालूम कहां भाग गया है ? [ यही कारण है कि
अब मुझे कोई दुःख प्रतीत नहीं होता । इसी से मैं कृतार्थ हो
चुका हूँ । ]