पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context१६ पञ्चदशी
कुर्वते कर्म भोगाय कर्म कर्तुं च भुञ्जते ।
नद्यां कीटा इवावर्तादावर्तान्तरमाशु ते ॥
व्रजन्तो जन्मनो जन्म लभन्ते नैव निर्वृतिम् ॥३०॥
[सुखादि को] भोगने के लिये तो ये कर्म करते हैं [आगे
को] कर्म करने के लिये ये भोगों को भोगते हैं। ऐसे ये जीव
नदी के उन कीड़ों की तरह हैं जो एक आवर्त से निकलकर झट-
पट दूसरे आवर्त में जा फँसते हैं। ऐसे ही ये जीव भी जन्म
से जन्म को पाते रहते हैं। इन्हें कभी भी विश्राम किंवा सुख
नहीं मिलता।
क्योंकि उनको आत्मतत्व का यथार्थ ज्ञान तो होता ही नहीं
इस कारण वे लोग भोग [सुख आदि के अनुभव] के लिये
[मनुष्यादि शरीरों में वस कर उन उन शरीरों के अनुकूल] कर्म
किया करते हैं। फिर कर्म करने के लिये [मनुष्यादि शरीरों के
द्वारा] उन उन फलों को भोगा करते हैं। फल को भोगना इस-
लिये आवश्यक होता है कि, यदि कर्म करने के बाद उन को
फल का अनुभव न हुआ करे, तो फिर उन प्राणियों को उस तरह
की इच्छायें ही पैदा न हुआ करें और फिर वे प्राणी उन उन
साधनों के अनुष्ठान में भी न लगा करें। यों जब कोई प्राणी
किसी भोग को भोग लेता है तब फिर वह शतगुण उत्साह से
वैसे वैसे कर्मों में जुट जाता है और जब कर्म कर चुकता है
तब हज़ारों आशाओं से भोगों की बाट देखा करता है। यों यह
कर्म और भोग का अनन्त चक्कर कभी समाप्त होने में ही नहीं
आता। ऐसे जीवों की गति नदी के बहाव में बहने वाले कीड़ों
की सी होती है, जो कभी एक भंवर में से निकलते हैं तो