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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 33 of 726

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Page 33

तत्त्वविवेकप्रकरणम् १५

तैरण्डस्तत्र भुवनं भोग्यभोगाश्रयोद्भवः ।
हिरण्यगर्भः स्थूलेऽस्मिन् देहे वैश्वानरो भवेत् ॥२८॥
उन पंचीकृत भूतों से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है। ब्रह्माण्ड
में भुवन, प्राणियों के भोगने योग्य भोग्यपदार्थ तथा उन उन
लोकों के अनुकूल शरीर [ईश्वर की आज्ञा से] उत्पन्न हो जाते
हैं। इस सम्पूर्ण स्थूल [विराट्] शरीर में अहंभाव से बैठने
वाला हिरण्यगर्भ 'वैश्वानर' कहाने लगता है ।
तैजसा विश्वतां याता देवतिर्यङ्नरादयः ।
ते पराग्दर्शिनः प्रत्यक्तत्वबोधविवर्जिता ॥२९॥
इस स्थूल शरीर में आते ही तैजस 'विश्व' हो जाते हैं,
जिनको देव तिर्यङ् तथा मनुष्यादि कहा जाने लगता है। वे
सभी बहिर्मुख हैं। इन किसी को भी आत्मतत्व का बोध
नहीं है।
इस स्थूल शरीर में अहंभाव से निवास करने वाले 'तैजस'
ही 'विश्व' कहाने लगते हैं। देवता पशु पक्षी तथा मनुष्यादि भेद
इन विश्वों के ही होते हैं। तैजसों में इस तरह का कोई भेद नहीं
होता। कारणशरीर तथा लिंगशरीर तो सब प्राणियों का एक
समान ही होता है। इनके केवल स्थूल शरीर ही भिन्न भिन्न
प्रकार के होते हैं। वे देवादि सभी पराग्दर्शी [बाह्यदर्शी] हैं। ये बाह्य
शब्दादि विषयों को ही देखा करते हैं। अपने दुर्भाग्य के कारण
ये प्रत्यगात्मा को नहीं देख पाते हैं। इन सभी को आत्मतत्व का
यथार्थ ज्ञान नहीं होता। यद्यपि तार्किक आदि लोग देह से भिन्न
आत्मा को पहचानते हैं परन्तु श्रुतिप्रतिपादित असंग आत्मरूप
का यथार्थ ज्ञान उन को भी नहीं हैं।