Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 35 of 726

Read in context
Page 35

तत्त्वविवेकप्रकरणम् १७
तुरन्त ही दूसरे में जा पड़ते हैं और कभी भी विश्राम नहीं पाते
हैं। इसी प्रकार ये प्राणी कर्म और भोग के इस भँवर में फँस
कर जन्म से जन्म को पाते हैं। इन हतभागियों को सुख के
चिरस्थायी दर्शन कभी भी नहीं होते।
सत्कर्मपरिपाकात्ते करुणानिधिनोद्धृताः ।
प्राप्य तीरतरुच्छायां विश्राम्यन्ति यथासुखम् ॥ ३१ ॥
नदी के वे कीड़े अपने किसी पुण्य कर्म का परिपाक होने
पर किसी कृपालु के द्वारा नदी में से बाहर निकाले जाकर किसी
किनारे के पेड़ की छाया में सुखपूर्वक विश्राम पा लेते हैं।
उपदेशमवाप्यैवमाचार्यात् तत्वदर्शिनः ।
पञ्चकोशविवेकेन लभन्ते निर्वृतिं पराम् ॥ ३२ ॥
इसी प्रकार जब किन्हीं के पूर्वोपार्जित कोटि पुण्य कर्मों का
परिपाक होता है तब वे प्राणी किसी तत्वदर्शी आचार्य से उपदेश
[श्रवण] को पाकर [आगे बतायी विधि से] पांच कोशों का
विवेक कर लेने पर, परानिर्वृति [मोक्ष सुख] को पा लेते हैं।
अन्नं प्राणो मनो बुद्धिरानन्दश्चेति पञ्च ते ।
कोशास्तैरावृतः स्वात्मा विस्मृत्या संसृतिं व्रजेत् ॥ ३३ ॥
अन्न, प्राण, मन, बुद्धि [विज्ञान] तथा आनन्द ये पांच कोश
कहाते हैं। [इनको कोश कहने का कारण यह है कि] इन कोशों
से आच्छादित हुआ अपना आत्मा, अपने स्वरूप को भूल जाने
के कारण, जन्म मरण रूपी संसार में फँस जाता है।
कोश [चन्दा] जैसे कोश बनाने वाले कीड़े के क्लेश का
कारण होता है अथवा जैसे कोश [म्यान] के अन्दर रक्खी हुई
तलवार का रूप छिप जाता है इसी प्रकार इन अन्नादि कोशों ने,
२