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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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खरबूजा जैसे स्वयमेव डण्ठल से अलग हो जाता है, या जैसे पक
जाने पर गर्भ माता की नाभि के बन्धन से टूट कर बाहर आ
जाता है, इसी प्रकार यह व्यवहारत्याग भी अत्यन्त स्वाभाविक
रूप में होना चाहिये। व्यवहार के रुकने के लिये कर्मों के क्षीण
होने की बाट बड़े धैर्य से देखनी चाहिये। जैसे छोड़ा हुआ बाण
ध्यान करने से बीच में नहीं रुक जाता, इसी प्रकार प्रारब्ध जब
तक समाप्त नहीं हो लेता तब तक व्यवहार किसी के भी रोके
रुक नहीं सकता।
विरलत्वं व्यवहृतेरिष्टं चेद् ध्यानमस्तु ते।
अबाधिकां व्यवहृतिं पश्यन् ध्यायाम्यहं कुतः ॥२६४॥
व्यवहार को विरल (कम) करने के लिये यदि तुझे ध्यान
करना पसन्द आता है तो तू ध्यान किया कर। परन्तु
मुझे तो अब यह व्यवहार बाधक ही नहीं दीखता है।
फिर मैं ध्यान के बखेड़े में क्यों पहूं ?
जब कि 'तज्जलान्' इस न्याय से सभी कुछ ब्रह्मतत्व है, तो इस
व्यवहार को भी ब्रह्मरूप में ही देखना चाहिये। आँखें बन्द करके
केवल एकान्त में बैठकर ही ब्रह्मतत्व का ध्यान करना तो ऐसा ही
है जैसे किसी बालक को एक कोठरी में बैठाकर दिशा बतायी गई
हों और फिर जब कहीं बाहिर उससे दिशा बूझी जाय कि इधर
कौनसी दिशा है ? और वह यह कहने लगे कि चलो कोठरी में
चलकर बताऊंगा। यहां तो मुझे मालूम नहीं है। ठीक इसी प्रकार
केवल ध्यानमुद्रा में बैठकर ही ब्रह्मतत्व को समझना और व्यवहार
में इस तत्व को भूल जाना—व्यवहार में इस तत्व को लागू न
करना—भी ऐसा ही अधूरा ज्ञान है। जो ज्ञान व्यवहार में न