पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context३१८ . पञ्चदशी
आ सके, व्यवहार की जरा सी ठोकर भी जिस ज्ञान से न
सहारी जाय, जो ज्ञान व्यवहारभीरु बनादे, वह ज्ञान ज्ञान
ही नहीं है। जिस ज्ञान के छोटे से कल्पित कोने में अनन्त
ब्रह्माण्ड भरे पड़े हैं, वही ज्ञान यदि व्यवहार के आ पड़ने पर
भाग खड़ा होता हो, तो उस ज्ञान को सच्चा ज्ञान मत समझो।
वह तो तोते के राम राम की तरह निर्वीर्य ज्ञान है। उस पर
मुक्ति रूपी फल कदापि लगने वाला नहीं है।
विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम।
विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः ॥२६५॥
मुझ को तो विक्षेप ही नहीं होता है, इसी से मुझे समाधि
की भी आवश्यकता नहीं है। विक्षेप और समाधि ये दोनों तो
विकारशील मन के ही धर्म हैं। [इन्द्रियों को रोककर ही दीखने
वाला आत्मा सच्चा आत्मा नहीं है। इन्द्रियों को रोककर चित्त-
वृत्ति को बन्द करके पाई हुई अवस्था तो योगवालों की समाधि
है। वेदान्त की समाधि तो यह है कि आत्मा और ब्रह्मतत्व
को एक समझा जाय और फिर अखण्ड ब्रह्मरूप होकर बैठा
जाय, हरएक क्रिया, हरएक व्यवहार, हरएक पदार्थ, हरएक प्राणी
ब्रह्मरूप दीखें यह तो—यही सहज समाधि है। यह करनी
नहीं पड़ती यह तो स्वभाव से होती है।]
नित्यानुभवरूपस्य को मे वानुभवः पृथक् ।
कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येवनि श्चयः ॥२६६॥
जो मैं नित्यानुभव स्वरूप हूँ, उस मुझ को मुझ से पृथक्
अनुभव भी क्या होगा ? [इसी से मैं समाधि के फल कहाने
वाले अनुभव के सम्पादन का उद्योग भी अब नहीं करता हूँ]