पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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व्यवहार चलता रह सकता है। [अनादिकाल की वासनायें
ज्ञानी से भी 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा कहला देती हैं]
प्रारब्धकर्मणि क्षीणे व्यवहारो निवर्तते ।
कर्माक्षये त्वसौ नैव शाम्येद् ध्यानसहस्रतः ॥२६३॥
प्रारब्ध कर्म के क्षीण हो जाने पर, व्यवहार भी (स्वयमेव)
शान्त हो जाता है, ध्यान रक्खो कि जब तक कर्म क्षीण नहीं
हो जाते, तब तक तो हज़ारों ध्यानों से भी यह व्यवहार
निवृत्त नहीं हो सकता ।
ऐसी अवस्था में व्यवहार को जबरदस्ती बन्द करने का वहम
झूठा वहम है। ज़बरदस्ती कर्मसन्यास का जो मार्ग है वह कल्याण
कारी नहीं है। एक जगह औषधप्रयोग से दबाया हुआ फोड़ा जैसे
दूसरी जगह फूट निकलता है, इसी प्रकार व्यवहार को ज़बरदस्ती
बन्द करने से या तो बाहर का बाज़ार अन्दर मन में जा लगता
है, या यह होता है कि एक जगह का व्यवहार बन्द करते ही,
व्यवहार का जो अनादि अभ्यास है, उससे दूसरी जगह दूसरी
तरह का व्यवहार होने लग पड़ता है। व्यवहार को ज़बरदस्ती
बन्द करने के इसी वहम से प्रभावित हुए पुरुष, स्त्री पुत्रों के या
घर के व्यवहार को छोड़कर महन्ती में या अन्य के प्रबन्धों में
फँसे पाये जाते हैं। देशान्तरवास का [कालेपानी का] दण्ड जिन
को राजा देता है उनका इस देश का व्यवहार तो बन्द हो
जाता है, परन्तु वे वहां जाकर नये सम्बन्ध बना ही लेते हैं।
यों व्यवहार ज़बरदस्ती बन्द करने की चीज़ नहीं है । व्यव-
हार छूटता है छोड़ा नहीं जाता। यह तो यमनियमों का अभ्यास
करते-करते स्वभाव से स्वयमेव छूटना चाहिये। पका हुआ