पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context१६ पञ्चदशी
प्रकार के शरीरों की उत्पत्ति करने के लिये, आकाश आदि पांच
भूतों में से प्रत्येक भूत को [जो कि अभी तक अपंचात्मक ही थे]
पंचात्मक कर देता है [जिससे कि उनसे जीवों के भोग के लिये
भोग्य अन्नपानादि तथा भोग्य मन्दिर शरीरादि का निर्माण
हो सके]।
द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः ।
स्वस्वेतरद्वितीयांशै योजनात् पञ्च पञ्च ते ॥५७॥
आकाशादि प्रत्येक भूत के पहले दो दो भाग किये जाँय ।
फिर उनमें के पहले एक भाग के तो चार चार भाग किये जाँय
[तथा दूसरे आधे भागों को पूरा ही रक्खा जाय] उसके पश्चात्
अपने अपने से भिन्न दूसरे दूसरे भागों के साथ योग करने से
ये पांचों भूत पंचीकृत हो जाते हैं।
पंचीकरण का चित्र
प्रत्येक भूत में आधा भाग अपना है तथा
आधे में शेष ४ भूत हैं
| आकाश | वायु | अग्नि | जल | पृथिवी |
|---|---|---|---|---|
| आकाश | वायु | अग्नि | जल | पृथिवी |
| वायु<br>अग्नि<br>जल<br>पृथिवी | आकाश<br>अग्नि<br>जल<br>पृथिवी | आकाश<br>वायु<br>जल<br>पृथिवी | आकाश<br>वायु<br>अग्नि<br>पृथिवी | आकाश<br>वायु<br>अग्नि<br>जल |