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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 315

तृप्तिदीपप्रकरणम् २९५
आत्मा का उपकरण बता दिया जाय। लोक में जो उभयात्मक
भोक्ता प्रसिद्ध है ये भोगोपकरण उसी के शेष हैं, इस बात का
श्रुति ने अनुवाद भर किया है। इन भोगों को शुद्ध आत्मतत्त्व
का शेष सिद्ध करने में श्रुति का अभिप्राय कदापि नहीं है]।
भोग्यानां भोक्तृशेषत्वान्माभोग्येष्वनुरज्यत्ताम् ।
भोक्त्र्येव प्रधानेऽतोऽनुरागं तं विधित्सति ॥२०२॥
भोग्य जो पति पत्नी आदि पदार्थ हैं, वे सब भोक्ता ही के
उपकरण हैं [जो भूल से अपने को भोक्ता मान रहा है ये उसी के
काम के हैं। जो अपने को भोक्ता नहीं समझता वे भोग उसके
किसी भी काम के नहीं हैं ] यह समझ कर भोगों में अनुराग
नहीं करना चाहिये। किन्तु अपना अनुराग प्रधानभूत भोक्ता
में ही रखना चाहिये, वह श्रुति बस यही बात लोगों को बताना
चाहती थी।
या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी ।
त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पतु ॥२०३॥
जो लोग अविवेकी हैं, जिन्हें आत्मतत्त्व का ज्ञान नहीं है,
उनकी विषयों में जैसी दृढ भक्ति होती है विषयों के प्रति वैसी
दृढ भक्ति हे लक्ष्मीपते ! तेरा सदा चिन्तन करते हुए मेरे मन
में से निकल कर भाग जाय [मेरा मन विषयों की आसक्ति
को छोड़ कर सदा तुम्हीं में रहने लगे]।
अथवा—अविवेकी लोगों को विषयों में जैसी दृढ प्रीति
हो रही है तेरा स्मरण करने वाले मेरे हृदय में से तेरी वैसी दृढ
प्रीति कभी भी न जाय [तेरे लिए वैसा दृढ अनुराग मेरे हृदय
में सदा ही बना रहे]।