Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 316 of 726

Read in context
Page 316

२१६ पञ्चदशी
इति न्यायेन सर्वस्माद् भोग्य जाताद् विरक्तधीः ।
उपसंहृत्य तां प्रीतिं भोक्त्र्येव बुभुत्सते ॥२०४॥
ऊपर कहे प्रकार से, पति पत्नी आदि सभी भोग्य पदार्थों
से विरक्त होकर, भोग्य पदार्थों में हमारा जो प्रेम बिखरा पड़ा
है उस प्रेम को भोक्ता आत्मा में ही समेट कर अब यह विवेकी
इसी आत्मतत्व को जानना चाहता है [ कि यह आत्मतत्व
कैसा है ? ]
स्रक्चन्दनवधूवस्त्रसुवर्णादिषु पामरः ।
अप्रमत्तो यथा, तद्वन्न प्रमाद्यति भोक्तरि ॥२०५॥
पामर प्राणी जैसे माला, चन्दन, पत्नी, वस्त्र तथा सुवर्ण
आदि पदार्थों [के कमाने और उनकी रक्षा करने] में सावधान
रहता है,[दिन रात जुटा रहता है—इनके कमाने आदि में दिन-
रात एक कर देता है] मुमुक्षु पुरुष की यह पहचान है कि—
वह भी इसी तरह, आत्मतत्व के विषय में कभी प्रमाद नहीं
करता । वह सदा उसी का चिन्तन करता रहता है । [उस पर
इसी प्रकार आत्मतत्व का स्पष्ट दर्शन कर लेने की धुन सवार
हो जाती है ] ।
काव्यनाटकतर्कादिमभ्यस्यति निरन्तरम् ।
विजिगीषुर्यथा, तद्वन्मुमुक्षुः स्वं विचारयेत् ॥२०६॥
विजिगीषु पुरुष जिस प्रकार सदा काव्य, नाटक तथा तर्क
आदि का अभ्यास किया करता है, मुमुक्षु लोग भी ऐसी ही
लगन से सदा अपने आत्मा का विचार किया करें ।
जपयागोपासनादि कुरुते श्रद्धया यथा ।
स्वर्गादिवाञ्छया, तद्वच्छ्रद्दध्यात् स्वे मुमुक्षया ॥२०७॥