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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 314

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२९४ पञ्चदशी

का जो विचार किया गया है, वहां सभी जगह यह परिपाटी
रक्खी है कि—उभयात्मक आत्मा से [ वर्णन करना ] प्रारम्भ
करके पीछे से कूटस्थ को शेष रख लिया जाता है। [अन्तः-
करण उपाधि वाले आत्मा से प्रारम्भ करके, केवल प्रज्ञानरूपी
कूटस्थ को शेष रख लिया जाता है। इन सब श्रुतियों के
विचार से यही सिद्ध होता है कि जो उभयात्मक भोक्ता है वह
तो मिथ्या होता है, तथा जो पारमार्थिक असङ्ग कूटस्थ है वह
अभोक्ता ही है]।
कूटस्थसत्यतां स्वस्मिन्नध्यस्यात्मविवेकतः।
तात्त्विकीं भोक्तृतां मत्वा न कदाचिज्जिहासति ॥२००॥
भोक्ता कहाने वाला यह जब अपने अविवेक के कारण,
अपने और कूटस्थ के विवेक को भूल जाता है, तब कूटस्थ की
सत्यता का अपने में अध्यास कर लेता है और उस सत्यता
के द्वारा अपने भोक्तापन को भी सत्य ही मान बैठता है। बस
फिर तो वह कभी भी भोगों को छोड़ना नहीं चाहता। [वह
समझता है कि मुझ में भोक्तापन सदा रहता है, मुझे भोगों की
ज़रूरत सदा ही रहती है, इस भ्रान्त विचार में आकर अब
वह भोगों को छोड़ना नहीं चाहता है]।
भोक्ता स्वस्यैव भोगाय पतिजायादिमिच्छति।
एष लौकिकवृत्तान्तः श्रुत्या सम्यगनूदितः ॥२०१॥
लोक में जो भोक्ता प्रसिद्ध है, वह अपने ही भोग के लिये
पति या पत्नी आदि भोगसामग्री को चाहा करता है। इस
लौकिक वृत्तान्त का ही श्रुति ने केवल अनुवाद कर दिया है।
उसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि—इन भोगों को कूटस्थ