पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextतृप्तिदीपप्रकरणम् २६५
विपरीत भावना तो भूख की तरह से केवल दृष्टबाधा ही
किया करती है । [यह बात सब के अनुभव से सिद्ध हो रही
है] उस विपरीत भावना को किसी भी उपाय से जीत लेना
चाहिये । उसके जीतने में अनुष्ठान का कोई भी निश्चित क्रम
नहीं हो सकता ।
उपायः पूर्वमेवोक्त स्तच्चिन्ताकथनादिकः ।
एतदेकपरत्वेऽपि निर्वन्धो ध्यानवन्नहि ॥११८॥
एक सौ छःवें श्लोक में उसी की चिन्ता, उसी का कथन
आदि उपाय का वर्णन तो हमने पहले ही कर दिया है। यद्यपि
उसमें तदेकपरता का कथन है,परन्तु ध्यान की तरह का कठिन
वन्धन उसमें नहीं है ।
मूर्तिप्रत्ययसान्तत्य मन्यानन्तरितं धियः ।
ध्यानं, तत्रातिनिर्वन्धो मनसश्चञ्चलात्मनः ॥११९॥
बुद्धि को जो मूर्ति का ज्ञान हो रहा है, वह ज्ञान निरन्तर
धाराप्रवाह रूप से चलता रहे, कोई भी विजातीय प्रत्यय उस
के बीच में न आये, तो बस इसी को 'ध्यान' कहते हैं। [सदा
घूमते रहने वाले हाथी घोड़े आदि को जैसे एक ठूंठ आदि
में बाँध दिया जाता है इसी तरह] इस चंचलात्मा मन को
इसी ध्यान में बाँध देना चाहिये ।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥१२०॥
गीता में भी कहा है कि—हे कृष्ण ! यह मन बड़ा ही
चंचल है, यह प्रमथनशील है [पुरुष को व्याकुल कर रखना
ही इसका स्वभाव है] यह बड़ा ही बल वाला है [इसका वश
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