पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context२६६ पञ्चदशी
में करना कोई सुकर काम नहीं है] यह बड़ा ही दृढ है [यह
सच्चे या झूठे किसी भी विषय में दृढता से गड़ा रहता है ।
उसमें से इसे उखाड़ लेना अशक्य काम समझा जाता है] इस
कारण उस मन के निग्रह करने को मैं वायु को रोक रखने के
समान ही सुदुष्कर काम मानता हूँ ।
अप्यब्धिपानान्महतः सुमेरून्मूलनादपि ।
अपि वह्न्यशनात् साधो विषमश्चित्तनिग्रहः ॥१२१॥
योगवासिष्ठ में भी कहा है कि—समुद्र को पी डालने से
सुमेरु पर्वत को उखाड़ डालने से या फिर दहकते अंगारों को
सटक लेने से भी हे साधो ! इस चित्त का निग्रह कर लेना
कहीं कठिन ही है ।
कथनादौ न निर्बन्धः शृङ्खलाबद्धदेहवत् ।
किन्त्वनन्तेतिहासाद्यै र्विनोदो नाट्यवद्धियः ॥१२२॥
श्रृंखला से बांधे हुए देह का जैसा निर्बन्ध होता है, ऐसा
निर्बन्ध कथन तथा चिन्ता आदि का नहीं माना जाता [निर्बन्ध न
हो इतना ही नहीं] प्रत्युत अनन्त इतिहास, युक्ति, दृष्टान्त आदि
के द्वारा इससे बुद्धि का विनोद भी तो होता ही है। जैसे कि
नाट्य को देखकर किसी की बुद्धि का विनोद होता हो। [यही
राजयोग की विशेषता है]
चिदेवात्मा जगन्मिथ्येत्यत्र पर्यवसानतः ।
निदिध्यासनविक्षेपो नेतिहासादिभिर्भवेत् ॥१२३॥
उन इतिहासादि का पर्यवसान केवल इसी अर्थ में होता
है कि—आत्मा चिन्मात्र स्वरूप है [वह देहादि रूप नहीं है]
तथा यह जगत् मिथ्या है । जब किसी को ऐसा निश्चय हो