पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context२२० पञ्चदशी
सुप्तिवद् विस्मृतिः सीमा भवेदूपरमस्य हि ।
दिशानया विनिश्चेयं तारतम्यमवान्तरम् ॥२८६॥
सोते हुए जैसे हम जगत् को भूल जाते हैं, जागते हुए भी
जब कोई इसी प्रकार जगत् को भूल जाय [मानो जगत् नाम
की कोई चीज़ ही न रही हो] बस इसी को उपरति की सीमा
समझ लेना । इनका अवान्तर न्यूनाधिकभाव तो इसी रीति से
अपनी अपनी बुद्धि से निश्चय कर लेना चाहिये ।
आरब्धकर्मनानात्वाद् बुद्धानामन्यथान्यथा ।
वर्तनं, तेन शास्त्रार्थे भ्रमितव्यं न पण्डितैः ॥२८७॥
प्रारब्ध कर्मों के नाना प्रकार का होने से, ज्ञानी लोग भी
भिन्न भिन्न प्रकार के आचरण वाले होते हैं। उनके भिन्न भिन्न
बर्तावों को देखकर शास्त्रार्थ के विषय में पण्डितों को भ्रम में
नहीं पड़ जाना चाहिये । [तत्त्वज्ञानी लोग भी रागादि वाले
होने से भिन्न प्रकार के आचरणों वाले पाये जाते हैं। फिर हम
ज्ञान को भी मुक्ति दिलाने वाला कैसे मान लें ? इस शंका का
समाधान यही है कि—ज्ञानी के शरीर के रोग या भूख आदि
जैसे उसके प्रारब्ध के फल होते हैं, इसी प्रकार ज्ञानी के राग द्वेष
आदि भी तो उसके प्रारब्ध कर्मों के ही फल हैं। इस कारण वे
रागादि, रोग आदि की तरह ही, ज्ञानी की मुक्ति का प्रतिबन्ध
नहीं कर सकते हैं।]
स्वस्वकर्मानुसारेण वर्तन्तां ते यथा तथा ।
अविशिष्टः सर्वबोधः समा मुक्तिरिति स्थितिः ॥२८८॥
सब लोगों को यह निश्चय कर रखना चाहिये कि—वे
ज्ञानी लोग अपने अपने प्रारब्ध कर्मों के अनुसार जैसा तैसा