पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextचित्रदीपप्रकरणम् २१९
परन्तु उसके दृष्टदुःखों का नाश नहीं हो सकेगा। [अथवा यों
कहो कि जीवन्मुक्ति का मज़ा उसके हाथ नहीं आयेगा]
नित्यानित्यवस्तुविवेक, शमादि साधन, वैराग्य और मुमुक्षु
भाव के रहने पर ही ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान हो जाय और
वैराग्य तथा उपरति न हों यह एक असाधारण अवस्था का वर्णन
ग्रन्थकार कर रहे हैं। हम लोग ऐसी अवस्था की कल्पना ही कर
सकते हैं। साधारणतया यह बात ठीक नहीं प्रतीत होती। परन्तु
ग्रन्थकार के अनुभवी होने के कारण इसको हम अपनी बुद्धि की
पहुँच के परे की बात मानकर चुप हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में
द्वैतविवेक प्रकरण के ५१ से ५७ तक श्लोक देखने से इस सिद्धान्त
की पुष्टि नहीं होती। इस कारण ज्ञान हो जाने और वैराग्य तथा
उपरति न होने की बात को हमारी बुद्धि बड़ी कठिनता से स्वीकार
करती है। ऐसा मालूम होता है कि कोई ऐसी अवस्था होती होगी—
कि ज्ञानी का ज्ञान किसी विषयभक्ति के कारण दबा पड़ा रहता
होगा और मृत्यु के समय उसकी वासनायें हट जाती होंगी और
उसे मुक्ति मिल जाती होगी। साधारण सिद्धान्त तो यही है कि
विमुक्तश्च विमुच्यते अर्थात् जीवन्मुक्तों को ही विदेहमुक्ति मिलती है।
ब्रह्मलोकतृणीकारो वैराग्यस्यावधिर्मतः ।
देहात्मवत् परात्मत्वदार्ढ्ये बोधः समाप्यते ॥२८५॥
ब्रह्मलोक मिलने लगे और उसे तृणतुल्य तुच्छ समझ कर
छोड़ दिया जाय यही वैराग्य की अन्तिम दशा है। अज्ञानी लोग
जैसे देह को आत्मा समझे बैठे हैं,वैसी दृढता के साथ,पर तत्व
को आत्मा समझ लिया जाय तो बस, यहाँ पहुँच कर बोध भी
समाप्त हो जाता है । [यही बोध की हद मानी गयी हैं]