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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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चित्रदीपप्रकरणम् २२१
बर्ताव करते हैं तो करते रहें। उन सब को जो अपने ब्रह्मत्व का
ज्ञान हुआ है वह तो सब का एक समान ही होता है और मुक्ति
भी उनकी एक समान ही होती है। [सब ही शुद्ध ब्रह्मरूप से स्थित
हो जाते हैं] यही शास्त्र की मर्यादा है।
जगच्चित्रं स्वचैतन्ये पटे चित्रमिवार्पितम् ।
मायया, तदुपेक्ष्यैव चैतन्यं परिशेष्यताम् ॥२८९॥
कपड़े पर खिंचे हुए चित्र की तरह, अपने आत्मचैतन्य में
जो जगत् रूपी चित्र, माया के प्रताप से खिंच गया है, उस
[जगतरूपी चित्र] की उपेक्षा करके [उस की ओर से अपनी
बुद्धि की आँख मींचकर] अपने आत्मचैतन्य को परिशेष
कर डालो।
चित्रदीपमिमं नित्यं येऽनुसन्दधते बुधाः ।
पश्यन्तोऽपि जगच्चित्रं ते मुह्यन्ति न पूर्ववत् ॥२९०॥
जो बुद्धिमान् लोग इस चित्रदीप नाम के प्रकरण का विचार
नित्य ही किया करेंगे, वे इस जगच्चित्र को देखकर भी, पहले की
तरह मोह को कभी प्राप्त नहीं होंगे।
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं चित्रदीपप्रकरणं समाप्तम् ।