पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextद्वैतविवेकप्रकरणम्
[विषय को व्याप्त करने वाली बुद्धि स्वयं भी विषय के
आकार की हो जाती है इस बात को सिद्ध करनेवाला दूसरा
दृष्टान्त यह है कि] जिस प्रकार व्यञ्जक [आतप आदि]
प्रकाश व्यङ्ग्य [घटादि] के आकार का हो जाता है, इसी
प्रकार, सकल पदार्थों का व्यञ्जक होने के कारण यह बुद्धि भी
पदार्थ के आकार की सी दीखने लगती है। जैसा आकार
पदार्थ का होता है वैसा ही आकार उस पदार्थ को देखनेवाली
बुद्धि का भी हो जाता है। [बुद्धिका वह आकार ही मनोमय
पदार्थ कहाता है। यही जीवों का बन्धक होता है। जिन
पदार्थों का हम अधिक संकल्प करते हैं उन पदार्थों के आकार
हमारी बुद्धि में जम जाते हैं। फिर उनके विषय के बहुत से
संकल्प बनते हैं। वे ही हमें बाँध रखते हैं। यों ईश्वर की
बनायी वस्तु हमें नहीं बाँधती किन्तु हमारी बनाई मनोमय
वस्तु ही हमें बाँधनेवाली है।]
मातु र्मानाभिनिष्पत्ति र्निष्पन्नं मेयमेति तत् ।
मेयाभिसंगतं तच्च मेयाभत्वं प्रपद्यते ॥३०॥
इसी विषय में वार्तिककार ने भी कहा है कि—पहले माता
[अर्थात् प्रमात] से [अन्तःकरणवृत्ति रूपी] प्रमाण की उत्पत्ति
हुआ करती है। जब वह प्रमाण उत्पन्न हो जाता है तब वह
[घटादि] मेय पदार्थों के पास जाता है। मेय पदार्थ से सम्बद्ध
हुआ वह प्रमाण उसी आकार का दीखने लग पड़ता है, जिस
आकार का कि प्रमेय पदार्थ होता है।
सत्येवं विषयौ द्वौ स्तो घटौ मृन्मयधीमयौ ।
मृन्मयो मानमेयः स्यात् साक्षिभास्यस्तु धीमयः ॥३१॥