पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context१०२ पञ्चदशी
इस सब कथन से यही सिद्ध होता है कि- घट दो प्रकार
का होता है- एक 'मृन्मय' दूसरा 'धीमय' । मृन्मय घट तो
प्रमाणों से जाना जाता है तथा धीमय घट साक्षिभास्य होता है।
(जब किसी घड़े को देखते हैं तब वहाँ दो घड़े होते हैं एक
तो मिट्टी का घड़ा तथा दूसरा मनोमय घड़ा) मिट्टी के घड़ों को
तो हम प्रमाणों से जानते हैं । उस मिट्टी के घड़े से जो मनो-
मय घड़ा बनता है उसको तो हम साक्षीप्रत्य से जाना
करते हैं।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां धीमयो जीवबन्धकृत् ।
सत्यस्मिन् सुखदुःखे स्त स्तस्मिन्नसति न द्वयम् ॥३२॥
अन्वय और व्यतिरेक से यह बात सिद्ध हो जाती है कि
(जीव का बनाया हुआ धीमय ( मनोमय ) द्वैत ही जीव को सुख)
बन्धन में डालनेवाला है [इस लिये वही हेय भी है ।] वे
अन्वय व्यतिरेक ये हैं कि- जीव के बनाये हुए इस मानस-
जगत् के विद्यमान रहने पर ही सुख दुःख होते हैं। उसके न
होने पर तो सुख या दुःख कुछ भी नहीं होते।
असत्यपि च बाह्यार्थे स्वप्नादौ बध्यते नरः ।
समाधिसुप्तिमूर्छासु सत्यप्यस्मिन्न बध्यते ॥३३॥
सपने आदि में बाह्य पदार्थ के न होने पर भी, मनुष्य
सुखी दुःखी होता है। समाधि सुप्ति या मूर्छा में बाह्यार्थ के
होने पर भी सुखी दुःखी नहीं होता है।
मनुष्यादि प्राणी स्वप्न या स्मृति आदि के समय, जब कि
अनुकूल स्त्री आदि सच्चा बाह्यार्थ नहीं होता, अथवा जब कि
प्रतिकूल व्याघ्रादि सच्चा पदार्थ नहीं होता तो भी सुखी या दुःखी