पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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भ्रान्तिस्वप्नमनोराज्यस्मृतिष्वस्तु मनोमयम् ।
जाग्रन्मानेन मेयस्य न मनोमयतेति चेत् ॥२६॥
फिर शंका होती है कि भ्रान्ति, स्वप्न, मनोराज्य तथा स्मृति
के समय [ जब कि बाह्य विषय नहीं होते ] तब वहां की वस्तुयें
'मनोमय' हुआ करें, परन्तु जो वस्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्रमेय
है उस वस्तु को 'मनोमय' क्योंकर मान लिया जाय ?
बाढं, माने तु मेयेन योगात् स्याद् विषयाकृतिः ।
भाष्यवार्तिककाराभ्या मयमर्थ उदीरितः ॥२७॥
यह तो ठीक है कि प्रमिति के स्थल में बाह्य विषय रहता
है [ उस विषय को जब हम मनोमय कहते हैं तब उसका
कारण हमसे सुन लो कि ] मान [ प्रमाण ] में जो विषयाकार
आता है वह तो मेय पदार्थ के संयोग से ही आता है [ उस
को ( मान में आये हुए विषयाकार को) ही हम मनोमय पदार्थ
कहते हैं ] भाष्यकार श्री शंकराचार्य तथा वार्तिककार सुरेश्वरा-
चार्य ने भी यही बात कही है ।
मूषासिक्तं यथा ताम्रं तन्निभं जायते यथा ।
रूपादीन् व्याप्नुवच्चित्तं तन्निभं दृश्यते ध्रुवम् ॥२८॥
भाष्यकार ने कहा है कि जैसे पिघला हुआ तांबा मूषा
[ मूस ] में जब ढाल दिया जाता है तब वह उसी के आकार
का होजाता है इसी प्रकार रूपादि विषयों को व्याप्त करने
किंवा अपना विषय बनाने वाला चित्त भी अवश्य ही उन
जैसा ही दीखने लगता है ।
व्यञ्जको वा यथाऽऽलोको व्यङ्ग्यस्याकारतामियात् ।
सर्वार्थव्यञ्जकत्वाद्धीरर्थाकारा प्रदृश्यते ॥२९॥