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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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ब्राह्मण को दान देना चाहिये, यथा योग्य सत्कार भी करें, पर उनका पथ--प्रद कभी नहिं बनना
चाहिये, शूरवीरता उनका धर्म अथवा कर्म कदापि नहिं कहला
इस पर क्षत्रिय को चाहिये अपने धर्म की रक्षा करता हुआ क्षत्रिय धर्म की रक्षा में अपनी
सर्वस्व आहुति देवे और अपनी मर्यादाओं तथा अपने धर्म तथा अपने राष्ट्र की मर्यादाओं, मान मर्यादा
किसी भी न प्रकार का भी धक्का न लगने देवे जिससे क्षत्रिय धर्म का नाम लज्जित हो सके तथा जो
क्षत्रिय हो कर अन्य वर्णवालों वर्ण को अथवा अपने ही कुल-धर्मवालों अर्थात् वैश्यों, वा शूद्रोंको वा
ब्राह्मण अथवा क्षत्रियोंके आधीन क्षत्रिय धर्म को रखे, अथवा जो क्षत्रिय कुल के होकर भी क्षत्रियों
द्वारा रक्षा न पा कर अन्य वर्णवालों की ही आधीन होकर क्षत्रियत्व को कलङ्कित करता हो अथवा जो ऐसो क्षत्रिय,
ब्राह्मण अथवा वैश्य, शूद्रोंके आधीन हो उनपर राज्य करनेकी चेष्टा करे तो क्या वह अपने को
क्षत्रियत्व धर्म पालने वाला वा क्षत्रिय कहलाने योग्य है? कभी नहीं, वरन् वह तो पापी तथा नीच है?
इस प्रकार क्षत्रिय को, क्षत्रिय धर्म की रक्षा का उद्योग करना चाहिये, तथा क्षत्रियों न को
कभी भी अन्य वर्ण पर राज्य करने की चेष्टा कदापि भी नहिं करनी चाहिये, वा अन्य किसी प्रकार अपने
विचार रखने चाहियें, न कि अन्य किसी प्रकार अपने को राज्यके भूखे साबित करके मर्यादाओं को नष्ट
कराकर राजनैतिक वा क्षत्रिय धर्म का विनाश ही कर बैठें॥
इस बात को तो सब सांसारिक मनुष्य भली प्रकार जानते ही हैं कि क्षत्रियों द्वारा
ब्राह्मणों को सदाचरण सम्बन्धी उपदेश ब्राह्मणों को ही तो क्षत्रियोंके आधीन रह कर ही
देना चाहिये जिससे क्षत्रियों द्वारा राष्ट्र की रक्षा तथा वैदिक मर्यादाओं भली प्रकार हो सके न कि,
ब्राह्मण क्षत्रिय धर्मपर आघात कर बैठें और स्वयं राष्ट्र पर राज्य करने लगें अथवा क्षत्रियों को राष्ट्र
की रक्षा का उद्योग नहिं करने देवे जिससे राष्ट्र में, वा संसारमें अशान्ति फैल जावे और
अन्य किसी पर अन्य का राज्य स्थापित होवे? तथापि वैश्यों शूद्र-वर्ग को तो क्षत्रिय धर्म की
मर्यादाओं नष्ट करनेका कभी स्वप्नमें भी विचार मन में भी न लाना चाहिये।
इसलिये क्षत्रियधर्मको ही सबने सदा मान्य तथा श्रेष्ठ धर्म माना है जिसको क्षत्रिय ही
धारण कर के रक्षा, वा राज्य शासन करते हैं, न कि अन्य ब्राह्मण वैश्यादि क्षत्रिय धर्म को
अपना कर, क्षत्रिय कहलाने का अधिकार, क्षत्रिय धर्मके आधीन रहकर ही तो पा सकते हैं?
अर्थात् क्षत्रियत्व की रक्षा ही, हर प्रकार से क्षत्रिय और क्षत्रिय धर्म द्वारा सब
मनुष्यों की हो सकती है, जो कि सब का रक्षक, सब का पोषण कर्ता एवं सबल क्षत्रिय अथवा
राजा कहलाता है? इस हेतु सब वर्णों, का कर्त्तव्य क्षत्रिय धर्मकी हर प्रकार से रक्षा करना तथा
क्षत्रियत्वको सब सदा अक्षुण्ण बनाये रखना, क्षत्रियों को किसी बात और किसी प्रकार का भी कष्ट,
चिन्ता वा शोक कभी नहिं होने देना, क्षत्रियों का मुख्य धर्म है॥
क्षत्रिय धर्म से ही सब वर्ण और धर्म की रक्षा हो सकती है। फिर जो वर्ण वा मनुष्य
किसी न प्रकार क्षत्रिय धर्म को धक्का पहुँचाने की कुचेष्टा करते अथवा करवाते हैं, क्या वे न
क्षत्रिय धर्मके प्रति द्रोह तो नहिं करते? क्या क्षत्रियत्व नष्ट करना न चाहते हैं? क्या धर्म
की हत्या करने वाले अथवा न करने वाले कहे जानेके वे पात्र नहिं बनते? जिस पर
सांसारिक प्रत्येक नर वा नारीका कर्त्तव्य बनता ही कि वे ऐसे लोगों को सख्त शिक्षा प्रदान
करें॥
सो इस प्रकार, क्षत्रियों द्वारा सदा संसारके सर्व मनुष्यों, विद्याभ्यासियों
को, धर्मोपदेशकों, तथा प्रजा-पालकवर्गों, वा सम्पूर्ण देश वासियों की ही
सुखपूर्वक रक्षा की चेष्टा की जाती रही, सो इस क्षत्रिय धर्म की रक्षाकी ही खातिर तो
इन सब को भी चेष्टा करनी चाहिये कि जिस से किसी प्रकार भी क्षत्रिय धर्मके विरुद्ध
कोई भी व्यक्ति न हो सके, वा क्षत्रियों द्वारा किये न जाने वाले किसी धर्म प्रचार
रूप कार्यमें इन सबको कभी नहिं प्रवृत्त होना चाहिये जिसका प्रभाव क्षत्रियत्वकी
मर्यादा गिराने वा क्षत्रिय धर्मके आधीन क्षत्रिय धर्मके विपरीत अन्य क्षत्रियत्व
का निर्माण कराने में सहायक होने का कारण बनता होवे जिससे क्षत्रियत्व तथा क्षत्रियत्व धर्म
लज्जित हो सके तथा ब्राह्मण आदि वर्णों को, अपनी मर्यादा तथा अपने कर्त्तव्य में
स्थिर रहना ही, अपने क्षत्रिय धर्मके प्रति कर्त्तव्य की मुख्यता है; जिससे कि सब ही
वर्णों की मर्यादा सुरक्षित, व स्थिर रह कर संसार परस्पर में सुखका उपभोग करने
समर्थवान् होवे
जिस का मुख्य ध्येय क्षत्रिय धर्म ही को ही सब प्रकार रक्षा का साधन रूप जान
कर, हर प्रकार क्षत्रिय धर्म की रक्षा की जावे जिससे कि सांसारिक सर्व वर्णों को ही इस
प्रकार, क्षत्रिय धर्मका सहारा हो, जो सांसारिक सर्व प्रजा तथा धर्म की ही रक्षा
कर सके वा अन्य वर्ण अपने धर्म का ही पालन कर सकेंगे, पर कभी क्षत्रिय धर्मकी मर्यादाओं
तथा अपने धर्म की सीमाओं का उल्लंघन
करने का पाप, हर एक वर्ण अपने अपने कर्त्तव्य पालन का ही तो नाम होवेगा वा क्षत्रिय
धर्मकी रक्षा ही का नाम होगा जो केवल ही सब सांसारिक सुख प्रदान करने वाली सिद्ध
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