Skip to content
SarvaKosh
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

Page 276 of 322

Read in context
Page 276

इस प्रकार स्पष्ट, सुदृढ़ अनुमान का बल पा कर वे मान गये जान पड़े किन्तु
वास्तव में वास्तव तक पहुँच सकने योग्य विवेक का उनमें लेश भी न था। इसलिए कुछ
दिनों उपरान्त ही, वेदान्ती की समालोचना पर अपनी सम्मति प्रकट करने के लिए जो पत्र
उन्होंने स्वामी जी के पास भेजा उससे पता लगा उनके पुराने विचार फिर उलटे ही रूप में
सामने आये।
पहले जो युक्तिपूर्वक उत्तर दे दिये गये थे उन सबको बिना समझे-बूझे उन्होंने फिर
लिखा कि ईसाई लोग वेदान्तियों की तरह यह तो स्वीकार ही नहीं करते कि, वह स्वयं
ही अपने रचे हुए समस्त संसार का कर्त्ता भी है और उपादान भी--
सदा सर्व काल साक्षी स्वयं रूप परमेश्वर
हेरान्द महाराज! यह वेदान्तियों सिद्धान्त केवल, यह कह करके छोड़
दिलायाजायगा कि मत करो भाई! क्योंकि वेदान्ती सिद्धान्त का कोई यह अर्थ नहीं करता कि जो
वेदान्तीहैं सोईईश्वरहैं। वेदान्तीका यह कथनहै कियहजो प्रतीतहोताहै सोईवहहै सोईवेदान्तीहैं
यह तो किसी रीति से भी घट नहीं सक्ता कियथा समुद्र की तरंगें हैं, सोई समुद्र नहीं
कहातीहैं किन्तु समुद्र ही तरंगें हैं॥
एक बात और भी है पादरी साहब की ओर से जिसका उत्तर आना बाकी रहा था कि
जो कार्य-कारण है, उसका ज्ञान केवल कार्यकारण सम्बन्धित, दशा ही तक हो सक्ता,
अन्य दशाओं तक तो नहीं रहा सो उस कार्य-कारण के ज्ञान द्वारा सब प्रकार का ज्ञान प्राप्त
हो जाय, यह बात ठीक प्रतीत नहीं होती। इस तरह अज्ञान-मूलक भ्रम में पड़े वेदान्ती ईश्वर
जैसी परम शक्ति को ही जगद्रूप में, स्वयं मिथ्या माया रूपी जाल रचने वाला कह कर
उसे अज्ञानी ठहराते हैं। जिस पर स्वामी जी का ज्ञान प्रकाश ऐसा हुआ जिसने ईसाई
को हक्का-बक्का कर दिया। उन्होंने कहा, जिसे तुम अज्ञान कहते हो, वह ज्ञान स्वरूप
का पूर्ण भान होना ही परमात्मा का लक्षण है। वह अपने भक्तों को इस जाल से पार लगा
देता है, सो भी परमात्मा स्वरूप सच्चिदानन्द परमात्मा के ज्ञान रूप का ही अंग है, तो
इसमें जो अज्ञानता मानी, क्या वह तुम्हारा अज्ञान ही नहीं कहा जायगा?
पादरीजी तर्क द्वारा तो जो कुछ उत्तर स्वामीजी द्वारा दिया गया उसे काट न
सके! इसलिए शास्त्र के पक्ष लेकर वे तर्क द्वारा समाधान करने लगे सो भी उल्टा ही
कर बैठे। वे कहने लगे कि ईसा, मूसा सब एक बात पर तो सहमत हैं कि परमेश्वर
एक जीव, जगत निर्माता जीवों का पिता तथा जगत् पालन कर्ता व संहारक, स्वामी
सर्वशक्ति सम्पन्न पर दया सिन्धु
ईसाई मत का यह मुख्य लक्षण पा कर स्वामी जी को पुनः स्पष्ट करना ही पड़ा।
क्योंकि वह, इस विषय मत पर कुछ वादविवाद नहीं करना चाहते थे। जब तक ईसाई
मत वाले अपने को सत्य समझ कर ईश्वर को इस संसारिक माया से परे मान कर
भिन्न रूप दें।
वेदान्तियों पर जो आक्षेप पादरी हेरान्द ने लगाये गये थे उनका एक रूप उपहास
मात्र सिद्ध हुआ। वेदान्तियों के जिस मत को पादरी हेरान्द भ्रम कह रहे थे वह स्वयं! ही
ईसाइयत सिद्ध कर रही थी। और इस तरह तर्क के आधार पर पादरी को मुंह की खानी-
पड़ी। वेदान्त को अज्ञान का साधन कहने वाला ईसाई मत जब स्वयं ही इस जाल में उलझ
गया तो? ईसाइयत का जो लक्षण पादरी ने बताया वह सब निराधार ही था, क्योंकि
वह सब अपने मनका फेर ही? ईसाई मत तो स्वयं ही विरोधाभास से भरा पड़ा है, वह
दूसरे मतों को क्या निर्देश देगा। जिसका अपना ज्ञान शून्य है उसका क्या कहें।
इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जब जब स्वामी जी द्वारा किसी भी
वेदान्ती व्याख्या का खण्डन चाहा गया तो! पादरी हेरान्द की तरह ईसाई विद्वान,
जिन्होंने मत का ज्ञान केवल, अपनी दृष्टि तक सीमित रखा, किसी भी सत्य विचार शास्त्र
को ठीक! से प्रतिपादित न कर सके। उनकी संकीर्णता के आगे वे परास्त होकर
वेदान्त को विकृत रूप देने का जो प्रयास करते उसका स्वामीजी ने मुंह तोड़ उत्तर
दिया और इस प्रकार सत्य का ज्ञान देकर अज्ञान के अन्धकार को दूर करने में सहायता
की व अपने ज्ञान रूपी प्रकाश से न केवल भारत अपितु विश्व के कोने कोने तक ज्ञान
फैला कर, सब को प्रेरित कर, इस बात का ज्ञान करा दिया कि सनातन वेदान्त ज्ञान
धरोहर, सम्पूर्ण का कल्याण ही इसका उद्देश्य रहा समस्त विश्व इसके लिए एक ही
परिवार प्रतीत हो सकता है। जिसका न आदि है न अन्त उस ज्ञान को कोई कैसे नष्ट कर
सके? जिस प्रकार! सूर्य का तेज सब ओर ज्ञान देता, सूर्य का प्रकाश सब दिशाओं
फैला कर अज्ञान को मिटाता है? सो ही काम सनातन वेदान्त ज्ञान करता है। यह सब
विवादों से परे हट कर विश्व को ज्ञानोपदेश देता है। यह सब ज्ञान केवल वेदान्तियों
का ही मत नहीं हो सकता, यह सब मानव व जीवमात्र
276