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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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विचारवान् को छोड़कर दूसरा कोई सदा सुखी विचरता कभी नहीं देखा गया तो ऐसा
विश्वास कर ऐसा ही आचरण कर।
ऐसा विचार कर, कि संसाररूपी इस कुसमय में किसे सुख है?
विचार करके कह, जगत् रूपी गढ़े में जो पड़कर दुःखरूपी कीचड़ कभी नहीं
देखता, कालरूपी सब भक्षक, सबको खाने वालेकी दाढ़ों तले नहीं पड़ता? साधो,
विचार करके कह--
"जो पुरुष ऐसा सदा रहे वा न देखा वा न सुना गया"
जो सब सुख-भोग का घर व सब जगत् का भक्षक बड़ा काल, सब कुछ
खा जाता केवल उस को छोड़ जो विचार रूप अमृत का पान कर चुका होकर सब
काल से पार चला जाता।
हे साधो! तू विचार कर संसार के सब जीवों को देख, सब ही
अज्ञान से बड़े दुःखी हो रहे हैं, जैसे सब जल से ही मत्स्यरूपी जीव जीते हैं,
अज्ञान से सब ही महामूर्ख हो रहे हैं। विचारवान् ही केवल सुख पाता है।
प्रथम विचार से ज्ञान को प्राप्त होना ही होता है। विचार करके ही चित्त
ब्रह्म रूप होता है। विचार ही परमात्मा की शरण को प्राप्त करता हुआ पुरुष
को सब तरह से, वा विचारवान् पुरुष को जगत् के सब सुख प्राप्त होते
हैं। विचार से, मुक्ति रूपी सब
सुखों को तू क्यों छोड़ता है? संसार को तू क्यों चाहता? तू तो विचार से
ही सब कुछ पावे।
ऐसा विचार किया कर, हे, मति! विचार करके सब पर दया कर वा विचार से
सब, सब वस्तु सब प्रकारकी प्राप्त होती है, सो उस सत्य विचार को ग्रहण कर
सब, ही सब कुछ पावेगा।
विचारवान् ही सब सम्पदाओं का भाजन, वा सब आपत्तियों का क्षय करने
का साधन सब विचार रूपी कल्पवृक्ष से ही फलवान् होता फल पाता।
जिस नर को यह विचार रूपी न तो कल्प वृक्ष ही व कामधेनु ही
चिन्तामणि मणिका ही साधन हो तो वह क्या करे उस दीन पुरुष के समान जगत
के सब जीवों को अज्ञान ही का भारी दुःख सदा ही रहता है। जो पुरुष
विचारवान् हुआ उसको तो विचार रूपी अमृत से, सुखों का सुख सब कुछ
चिन्तामणि से अधिक मिलता ही है। जो पुरुष इस संसार रूपी
महा मरुस्थल में तो जन्म धारण करके अमृत समान रसपान को नहीं करता
तिस नर सदृश अभागा कौन कहा जावे? संसार रूपी बवंडर
सब काल ही भ्रमरूप फैला रहा है। इस बवंडर में सब ही पतंग-
रूप होकर सब काल ही उड़--उड़ जाते हैं, केवल जिसे तृण रूप इस जगत्--
का त्याग रूप ही साधन हो वा जो ज्ञान रूप पर्वत पर दृढ़ होकर स्थित हो सो
ही बच सकता है। विचारवान् ही ज्ञान को पाता
जिस पुरुष विचारवान् को, तृणारविन्द समान यह सब जग लगे? ऐसा कह,
किसको संसार सुख का कारण है? सब दुःख ही?
विचारवान् ही सब से श्रेष्ठ जगत् में।
जिस समय ऐसा विचार बढ़े, तब ही चित्त शान्ति पावे! जो सब सुख देता? ऐसा
विचार करके सब को निवृत्ति प्राप्त हो।
विचारवान् को क्या, सब बड़ा कहें? जो पुरुष शांत मन से युक्त हो सो, ही
प्रथम विचार से विचार कर सब कुछ पा लेता है? विचार कर ही सब प्रकार
सुख है?
संसार समुद्र समान अपार को विचारवान् ही तरता है, सो नर ही नर,
पशु-समान जगत् भरता ही है। इस लिए सदा विचार करके ही सब को पार
कर वा पार होकर सब से श्रेष्ठ पद विचारवान् ही केवल सब प्रकार से
प्राप्त कर लेता है। विचार से ही विचार रूप सब सुखों को प्राप्त हो
जाता ही संसार रूपी भ्रमजाल कभी नहीं तो विचारवान् को मोहता
नहीं है।
ऐसा विचार करके सब संसार रूपी इस तृषा का नाश हो जाता।
केवल सब सुख शांति प्राप्त कर विचारवान् कभी इस जन्म मरणरूपी चक्कर में,
चौरासी चौरासी सहस्र लक्ष जीव योनि भ्रम-भ्रम से कभी चक्कर नहीं
खाता है। विचारवान् केवल जगत हितकर विचार द्वारा ही सब कुछ विचारता
रहता।
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