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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 322 में से

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॥ श्री रामचरित मानस ॥
अयोध्या काण्डम्
छठे दिवस कथा का विश्राम

दोहा 17
भरतहि सोचु नृपहि कृत कीन्ह विरंचि प्रपंचु
पात पात फल फलहिं तरु कीन्ह सत्य निज नेम॥
सानुज भरतु समेत सब परिछन मातु समेत
भोरहिं भोरहिं भरतु बहोरी निज कुल रीति बिचारि
परिछत सब निज चरणन लागन कहि सब सादर
सो सुनि सानुज भरत तब चरणनि पर सिरु नाइ॥

दोहा 18
भरत सो सोच नृपहि कृत कीन्ह बिपुल
सब विधि सब विधि भाइ सों कीन्ह बिधाता बाम
परिहरि सब जंजाल परिहरि सबहिं सनेह
कहत भरत सब सों दुख भारी कीन्ह बिधाता बाम
"तात" तात कहि बिकल रोवत न सकहिं सम्हारि
सो सुनि सानुज भरत तब चरणनि पर सिरु नाइ॥

दोहा 19
कहत सबहिं भरत बिकल रोवत अति भारी
तात तात कहि रोवत भारी
कहत भरत सब सों दुख भारी कीन्ह बिधाता बाम
तात तात कहि रोवत भारी रोवत सब नर नारि
भरतहि सोचु नृपहि कृत कीन्ह बिपुल प्रपंचु
पात पात फल फलहिं तरु कीन्ह सत्य निज नेम॥
परिछत सब निज चरणन लागन कहि सब सादर
सो सुनि सानुज भरत तब चरणनि पर सिरु नाइ॥

भरत जी विचार करते-करते व्याकुल होकर गिरते पड़े! तात! तात! तात! सब कुछ तो
गया! जिस पर इतना भरोसा था? वो कैकेयी जिसने ही प्राण ले ली उस की,
जिसको मर्यादा का ज्ञान था। जिस कुल में? उस कुल को खा गई? जिस
पर मान था सब कुछ छोड़कर, सब पर भारी पड़ा! उस पर प्राण त्यागे! तो
उस समय राम व लक्ष्मण, वो समय ऐसा आया कि उस समय राम भी न मिले
प्रभु भी चले गये और वो भी चले गये। जिस पर भरोसा था? उस कुल का
जो सिर मौर्य था समाप्त हो गया? भरत जी कहते हैं रोते-रोते, जब तक यह
विश्वामित्र...? सब तो समाप्त करके ही दम लेंगे जो विधाता का विधान था
ऐसा क्यों हुआ? इसके बाद
भरत जी उठते हैं और रोते हुए पिता को देखते हैं और अपने को धिक्कारने
लगते हैं और कहते हैं, हे मेरे प्रभु, हे मेरे तात, आपने सत्य को मान देकर अपनी
प्राण प्रतिष्ठा-प्रतिज्ञा को पूरा किया और अपने को मुक्त कर दिया और मुझे
इस भव सागर में छोड़ दिया, हे कैकेयी माता तुमने ऐसा, जिसका फल जीवन
भर मुझे भोगना पड़ेगा, कभी नहीं सोचा? वो अपनी कुल मर्यादा को भूल
"अयोध्या का सुख भोगने वाली-कैकेयी जिसके कारण सारा साम्राज्य
कलंकित हुआ जिसका कारण सिर्फ वो कैकेयी थी जो सब कुछ जान बूझ
करके भी चुप, अपने स्वार्थ के सामने सब कुछ कुर्बान कर दिया, वो
यह भी न सोच सकी कि इस सबके पीछे कितना बड़ा अनर्थ होगा, कैकेयी तूने
मुझे कलंकित कर दिया, वो विश्वामित्र के कुलघातक को सब कुछ दिया जिसे
मैंने अपना माना, वो ही मेरे लिए काल बनकर आया"
आज सब कुछ? किसे कहूँ? किसको जाकर कहूँ? विश्वामित्र को सब
बताया गया, लेकिन वो सब कुछ तो समाप्त कर चुके थे अब तो केवल
रोना, विलाप सब कुछ रह गया था, लेकिन सिर्फ रो! स्वयं भगवान को पाकर
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