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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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विभूति को पा सकेगा या विज्ञानालोकित पद पावेगा और, उस समय राजा या प्रजा
हो !
पर केवल इस बात आत्मोत्कर्ष से, या आत्मविकास से काम नहीं चल सकता
विचार से विचार का मेल और सहानुभूति विहीनता का स्थान नहीं पाता अतः न
वैयक्तिक विकास सार्वजनीनता के साथ जब सम्बद्ध हो तभी वह जनो-
पयोगी काम कर सकता तथापि इस बात को भी न तो हम ही अस्वीकार
रूप दिया जा रहा था और न ही इन दोनों में इस बात का ही कुछ विरोध
उपस्थित था केवल उन दोनों के मन में इस बात में मतभेद मात्र दिख रहा था,
सम्भवतः, जो हो सो हो, परन्तु यह बात तो निश्चित रूप से स्पष्ट हो
सकती है कि उस युग तक जन सत्ता का उदय
अपने आप नहीं था, न ही वह अपने बल पर था, न कोई वैसी चेष्टा ही
इधर से हो सकी थी जिससे यह कहा जावे कि जनता ने अपने अधिकार को पा
था, अथवा जन तंत्र
बात ऐसा था, जिसे दो जन नेता सुलझा
या सुलझाने का यत्न कर रहे थे तथा इन दोनों का स्वरूप न
तो एक सा था ही, न जन नेता इस बात बात को ही जन के हित में सोच
कर रहे थे? केवल वे अपने पक्ष को इस दृष्टि से, जिस से उनका ही
मत माना जावे विचार रहे थे और जब यह बात हो गई, जिसे दो
नेता जन के नाम पर जन
का भला कर रहे हों अथवा न कर रहे हों, अतः उस व्यवस्था के
लिए यह तो मानना, स्वाभाविक ही होगा कि जन का बल न तो था,
न था तो इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह एक
साधन अवश्य ही बन गया था और इस बात का प्रमाण भी इस बात
द्वारा हो जाता रहा जिसे हम ने देखा कि व्यवस्था के अनुकूल जन,
जिसे चाहे इधर कर ले या उधर कर ले अथवा जन अपने को जिस ओर
चाहे ले जावे ।
दूसरी बात यह भी थी कि उत्तर-मध्य काल प्रायः सब तरह अशांत
रहा था न केवल-मध्य काल प्रायः सब तरह अशांत ही था जन-मन भी उस काल
में न केवल क्षुब्ध, पर बात ऐसी अवस्था में जन का काम तो न हो कर
ही काम बन रहा था तथा जन का मन ही न तो इस बात के लिए
तत्पर था कि जन अपने रूप को समझे, न यह बात, जिससे जन को लाभ हो
कर सके, प्रत्युत वे तो एक, जो राजनीतिक रूप से अपने हित को ही
सोच रहे थे उनका
अनुगमन ही करते रहे या यों कह लें कि राजनीतिक सत्ता के जन को
बना ही ले रहे थे अथवा, ले ही रहे थे, पर इस बात की भी कोई चिन्ता
नहीं की जा रही थी तथा कोई ऐसा भी यत्न नहीं किया गया था कि
जनता को इस बात का तो बोध दिया ही जावे जिससे? वह उस रूप
को न समझे जो जनता के हित की बात थी; सो वह रूप
विहीन
केवल राजनीतिक ही दृष्टि तक ही सब कुछ सीमित था और यही
राजनीतिक जन सत्ता को जन्म दे, जिस से आगे जन सत्ता का रूप निखरे,
यह सम्भव, जन विहीन सत्ता अपने सीमित स्वरूप को, जिसे जन कहा जा
ही सकता के प्रभाव से परे न होने दिया तथा इस से जन को
इतना लाभ मात्र हो सका कि वे केवल अपने स्वत्व को समझने के लिए
ही जाग सके, जिसे वे जन हित समझ कर ही नहीं रहे बल्कि न तो अपने
हित को समझ सके, न अपना विकास ही कर सके ।
क्या राजनीतिक सत्ता से जन-हित सम्भव है? जन का यह स्वरूप उस काल
तक बना रहा अथवा न रहा? इस पर तो विचार किया ही जाना चाहिए
क्योंकि मध्य कालीन इतिहास के जो पृष्ठ हैं, वे केवल, राजनीतिक ही रहे हैं
जिस जन का, जन सत्ता के पक्ष से सम्बन्ध
व्यवस्था जन आन्दोलन के रूप में तो काम करती रही! व्यवस्था
का भी आधार जन आन्दोलन ही, जिसे जन आन्दोलन न भी कह सकें,
पर उस का रूप तो यही था जिस से जनता को ही लाभ हो या हानि और
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