एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)
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Read in contextइस बात सम्भावनाओं पर, विचार तो सब कर रहे थेलेकिन इसका कोई उपाय सो, किसी
पास न थाअथवा किसी उपाय के योग्य नथा
इस परिस्थिति मे भी सब उपस्थित थे, न सब युधिष्ठिर के, न सब
दुर्योधनके पक्ष मेथीउनमे से बहुततो, इन दोनों परिवारों अथवा दो राज
परिवारों के दो अलग होने पर भीनये उभरे उस राज्य के साथ उसी प्रकार जुडे
रहना
का दावा करते आये थे। राज्य इनके भरोसे नहीं था और न ये लोग राज्य के भरोसे जीते।
यह केवल कुछ ऐसा वर्ग था जो अपने को उस समय तक के किसी राजा से भी अधिक,
सम्मानीय पद का धनी
कह रहा था। केवल यही वर्ग था जो दोनों ओर की बात सुन सकता था, दोनों पक्षों
बात सुन कर इन पर प्रभाव डाल कर इन दोनों-को अपने प्रभावकारी निर्णय स्वीकार करने को बाध्यकर
इस विग्रह को टाल सकता था, यदि इनके पास कोई ठोस विकल्प होता।
युधिष्ठिरका रुख तो इस विषय मे स्पष्ट था, वह तो अपना हक
छोडने वाले नही थे।उन्हें इस बात का, जिसे वो अपनी सत्ता का भाग कह रहे थे
की विशेष चिन्ता न थी।वे जानते थेकि इस प्रकार के अधिकार तो उनके
भीष्म पितामह से ले कर तक प्रत्येक पुरुष के पास थे। बस नहीं था
अधिकार तो वह था केवल न्याय का और न्याय का जो निर्णय होता था उस पर
राज्य का विधान काम करता था। यदि युधिष्ठिर केवल राज्य-भाग चाहते तो केवल पाँच
गाँवकी ही माँग कभी न करते। इस प्रकार पाँच गाँवों की माँग करके, वह इस
अधिकार के साथ न्याय विधान स्थापित करने के लिये वचन बद्ध थेऔर यह अधिकार ही
उन्हे प्राप्त "नहीं हुआ!"
यह अधिकार केवल राज्य तक ही सीमित नहीं था या केवल हक तक ही नहीं था।
वास्तव मे तो यह सब उस न्याय की बात थीजिस पर आगे आने वाली सभी पीढि-
योंको अपना जीवन बिताना था। यदि इस समय वे किसी के दबाव मे आ कर पीछे हट
ते, यदि वो न्याय के साथ न खडे हो पाते तो फिर सब कुछ उलट-पुलट हो कर रह
ही जाता, जिसे बचाना ही युधिष्ठिर
न्याय का पर्याय मानते थे, धर्म का सार, जिससे मानव जाति निर्बाध रूप
अपने मार्ग पर बढती, चलती; जिसे सब प्रकार के संशय कभी कोई नया संकट
खडा न कर सकते । वे इस अधिकार, न्याय के साथ थे; इसलिए वे अपने इस
निश्चय पर से कभी न हटते । इस सब के बाद जो कुछ भी था, केवल यह देखना
था, कि कौन उन के साथ था अथवा उन की बात मान कर इस पर चलता
जब कि दुर्योधन का रुख, अपनी महत्वाकांक्षा तथा उन सबोँ का था
जो केवल आज की सत्ता के साथ जुडे रहने को ही अपना धर्म मान रहे थे और इस
लिए वो राजा की ओर से मिलने वाले हर अन्याय के साथ खडे हो कर अपने
स्वार्थ को ही सब कुछ मान रहे थे।अन्याय की सीमा भी राजा के साथ बँधी
थी, जो वो कहता था, उसी को अपने हित के लिए सब कुछ माना जा रहा था, न किसी
को
प्रकार की भय था या फिर अपनी ओर से कोई नयी बात कहने का साहस
रह गया था।इस प्रकार सत्ता के सहयोगियों का यह रूप आज भी कम या ज्यादा रूप
मे सब को ही हर जगह देखने को मिल सकता है। आज भी, सत्ता के ऐसे
रूप साथ
लगे हुए चाटुकार हर बात पर ताली बजाने को तैयार है! राजा सब कुछइनकी
ही सहायता से करता जाता है, न तो कभी प्रजाकी भलाई का ध्यान, केवल अपनी
और अपनों लाभ अधिक दिखाई पडता है।जिसके परिणाम भयंकर होते जातेहैं,
आज स्थिति ही कुछ ऐसी है! केवल सत्ता चाहिए या फिर धन! इसके बाद सब कुछ
राजा के ही साथ है, राजा केवल धनवानों का राजा है! जो भी हो आज यही बात
सामने आ रही थी, दुर्योधन के इस रुख से प्रत्येक हैरान था, वो भी
जो उसके पक्ष मे खडे थे या उसके दल मे अपने लाभ अथवा भयवश ही शामिल हो रहे
थे। न कोई विचार
केवल अपने लाभ का, अपने यश, अपनी साख, सम्बन्धी बातों तक ही
था, केवल भीष्म को ही इस परिस्थिति का दुख था जो सब के ही थे।लेकिन
इस सबमे? सब का न्याय कहाँ खडा था? आज भीष्म किसी लायक नहीं थे,
जिनका केवल नाम मात्र ही था? सब दुर्योधन के? शक्तिशाली दुर्योधन के साथ
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