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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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उपशमभावके समान अन्य कोईभी दूसरा गुणवान् नहींहै। इसकारण आत्माको शान्तरूप अपने
स्वभावकी प्राप्तिही परम सुखका कारणहै। संसारकी सब वस्तुएं तो क्षण मात्रके लिये सुखका
निमित्तमात्र बनकर फिर सौ गुना दुःखका कारण बनती हैं। उस कारणसे जो वस्तुएं सब दुःखों को देने-
की, हर एक प्रकारका क्लेश करानेवाली हैं। उन सब वस्तुओंको दूरसेही छोड़ना चाहिये।
इस तरह जब आत्मारामका ध्यान लगाया जावे तब ऐसा विचार कभी नहीं करना, जिससे कि
अपना चित्त चंचल होकर ध्यान से भ्रष्ट होजाय। अथवा ध्यान तो छूटजाय, पर दूसरा कोईभी
ऐसा विषय रूपी कीचड़ न मिले जिससे कि आत्माको शान्ति मिलसके, जिससे कि परिणामों
स्वरूप बिगड़ जावेगा, जिससे कि कर्म-वर्गणाके पुद्गल रूपी परमाणुओं का रस वा परिपाक
बिगड़कर, जो रस वा फल दुःख रूप मिलना था वह अति तीव्र रूप हो, उसका फलभी सब ही
प्रकारसे आत्माको दुःख रूपही भोगना पड़े।
इस लिये आत्माको इस बातका विचार, जिससे परिणाम चंचल हों और रस घट जावे,
परिणामोंकी धारा बिगड़ जावे और आत्मा अशान्त होजाय। आत्माके कल्याणकी इच्छा करने-
को तो सब प्रकार अपने आत्माको ज्ञान स्वरूप, सब पर द्रव्योंसे उदास और पर द्रव्योंके
विषय रूपी? परिणाम होने योग्य?
ऐसा विचार करें, जिससे कि आत्मा और कर्म-वर्गणा के मध्यमें भिन्नता हो कर
यह निश्चय करने की कोशिशकी जाय कि यह शरीर पुद्गलका बना हुआ पुद्गल रूप है।
इसका रूप रस गंधादि पुद्गलमय होनेसे यह पुद्गलके धर्मवाला ही रहेगा। पर मैं पुद्गल
का, इसके रूपका, गंधका वा अन्य पर भावोंका स्वामी न होकर अपने शुद्ध ज्ञान-दर्शन
का स्वामीहूं।
मैं तो शुद्ध ज्ञान स्वरूपहूं।
इस पर भी यदि कोई यह शंका करे कि क्या आत्मा कभी? ऐसा बन सकताहै?
तब उस शंकाके उत्तर में समाधान इस तरह से हो सकता है कि जिस प्रकार दूधमें
मिला हुआ जल, जो कि देखने में सफेदी लिये हुये अपनी सफेदी रूप दूध ही के साथ एक रूप
रहता हुआभी, जब हंसके मुख द्वारा दोनोंका पृथक्करण ( अलगाया )जाताहै तब जल
अलग ही, और दूधअलग ही रहताहै, इसी तरह जिस प्रकार तपे हुये लोहेमें अग्नि जलके
सम्पर्क से नष्ट, वा उस सम्पर्क से निवृत्त होने योग्य हो जाती है। उसी प्रकार आत्मा व
कर्म
दोनों परस्पर मिले हुये हैं, पर आत्माका रस नष्ट नहीं, केवल पुद्गल
परमाणुओं का ही रस घट बढ़ सकता है। जो आत्माके साथ अनादिकालसे सम्बन्धमें
आ रहे हैं। उन कर्म-परमाणुओंके रसमें और आत्माके गुणोंमें अन्तर है। इस लिये जो ज्ञान
स्वरूपहै, उस रूप ही? उस रूप कभी नहीं? इस प्रकार से विचार करे।
अथवा ऐसा विचार करे, जिस प्रकार सुवर्ण रूप धातु खानमेंसे जैसी निकलतीहै,
उसमें किट्ट वा मैल वा कीचड़ प्रचुरतासे लगा हुआ रहता है जिससे न उसका रूप ही
दिखाई पड़ताहै और न यह, कि इस सुवर्ण पाषाण में कितना वा क्या सुवर्णका रूप और
वजन है। इसका ज्ञान भी नहीं होता, पर जब सुवर्ण पाषाणको अग्निमें तपाया जाता है तब
शुद्ध! सुवर्ण अपने रूप और गुण सहित उस धातुके रूपमें प्रकट होकर ही रहता है। यद्यपि
वह सुवर्ण पाषाण अवस्था में तपाने पर मल और तपने रूपी दुःख को सहता है,
जिसके बाद वह अपने शुद्ध स्वरूपमें प्रकट होता है। इसके समान? सुवर्ण रूपी तो यह
आत्मा अनादि कालसे कर्मों रूपी पाषाणके समानहै? अथवा किट्ट और कालिमाके समानहै?
जब यह ज्ञान रूपी अग्निके द्वारा तपाया जावेगा, कर्मोंका विपाक हो कर
ज्ञान स्वरूप शुद्ध होकर यह आत्मा अपने ज्ञानादि कर्म-हीन हो, केवल ही शुद्ध
आत्मा रहकर जो इस समय है, उससे न तो कम आत्मा रहेगा और न अधिक होगा,
ऐसा विचार करे? इस विचारको ही भेद या भिन्न
ज्ञान कहा जाताहै। पुद्गल वा शरीरसे अपने आपको भिन्न जानना, पर द्रव्यों को
अपने स्वरूपसे सर्वथा पृथक्‌ही समझना, यह सब अध्यात्म या व्यवहार-नयके
इन दोनों का स्वरूप ज्ञान द्वारा जाना जा कर अपने ध्यान में लीनता की जाय तब कर्म
क्षय होने पर आत्मा ज्ञानानन्द स्वरूप सुखको प्राप्त होताहै, जिस सुखका भोग यह
सदा ही करताहै।
जो मनुष्य ध्यान, तप वा अध्यात्मके द्वारा आत्म रसका पान करलेता है,
वह संसारके सुखों को तृणके सम, तुच्छ समझता हुआ विषय, भोगों तथा इन्द्रियके सुखों
को कीचड़-समान मन्द वा तुच्छ समझ कर न तो विषय रूप भोगोंके भोगनेकी ही इच्छा
करता है। न ही वह भोग रूपी सुखोंमें भ्रष्ट? ही हो सकताहै। इन सब बातोंका यही
सारांश है, कि सब ही पर द्रव्यों को न छूकर, केवल ही अपने रूप में लीन, मग्न वा तल्लीन होना
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