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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished318 pages

Page 311 of 318

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Page 311

३०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६७

शङ्खे तोयं विनिक्षिप्य सितपुष्पाक्षतैर्युतम्।
मन्त्रेणानेन वै दद्याच्छितपुष्पादिनार्चिते ॥ १३
काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव।
मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते ॥ १४
आतापी भक्षितो येन वातापी च महासुरः।
समुद्रः शोषितो येन सोऽगस्त्यः प्रीयतां मम ॥ १५
एवं तु दद्याद्यो सर्वमगस्त्ये वै दिशं प्रति।
सर्वपापविनिर्मुक्तस्तमस्तरति दुस्तरम् ॥ १६
शङ्खमें श्वेत पुष्प और अक्षतसहित जल रखकर श्वेत पुष्प आदिसे पूजित हुए अगस्त्यजीके प्रति निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्य पढ़कर अर्घ्य निवेदन करे—'अग्नि और वायु देवतासे प्रकट हुए अगस्त्यजी! काश पुष्पके समान उज्ज्वल वर्णवाले कुम्भज मुने! मित्र और वरुणके पुत्र भगवान् कुम्भयोने! आपको नमस्कार है। जिन्होंने महान् असुर आतापी और वातापीको भक्षण कर लिया और समुद्रको भी सोख डाला, वे अगस्त्यजी मुझपर प्रसन्न हों।' इस प्रकार कहकर जो पुरुष अगस्त्यकी दिशा (दक्षिण)-के प्रति अर्घ्य अर्पण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो, दुस्तर मोहान्धकारसे पार हो जाता है॥ १२—१६॥

एवं ते कथितं सर्वं भरद्वाज महामुने।
पुराणं नारसिंहं च मुनीनां संनिधौ मया ॥ १७
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं चैव सर्वमेव प्रकीर्तितम् ॥ १८
ब्रह्मणैव पुरा प्रोक्तं मरीच्यादिषु वै मुने।
तेभ्यश्च भृगुणा प्रोक्तं मार्कण्डेयाय वै ततः ॥ १९
मार्कण्डेयेन वै प्रोक्तं राज्ञो नागकुलस्य ह।
प्रसादान्नारसिंहस्य प्राप्तं व्यासेन धीमता ॥ २०
तत्प्रसादान्मया प्राप्तं सर्वपापप्रणाशनम्।
पुराणं नरसिंहस्य मया च कथितं तव ॥ २१
मुनीनां संनिधौ पुण्यं स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम्।
महामुने! भरद्वाजजी! इस प्रकार मैंने मुनियोंके निकट यह पूरा 'नरसिंहपुराण' आपको सुनाया। इसमें मैंने सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—सभीका वर्णन किया है। मुने! इस पुराणको सर्वप्रथम ब्रह्माजीने मरीचि आदि मुनियोंके प्रति कहा था। उन मुनियोंमेंसे भृगुजीने मार्कण्डेयजीके प्रति इसे कहा और मार्कण्डेयजीने नागकुलोत्पन्न राजा सहस्रानीकको इसका श्रवण कराया। फिर भगवान् नरसिंहकी कृपासे इस पुराणको बुद्धिमान् श्रीव्यासजीने प्राप्त किया। उनकी अनुकम्पासे मैंने इस सर्वपापनाशक पवित्र पुराणका ज्ञान प्राप्त किया और इस समय मैंने यह नरसिंहपुराण इन मुनियोंके निकट आपसे कहा। अब आपका कल्याण हो, मैं जा रहा हूँ॥ १७—२११/२॥

यः शृणोति शुचिर्भूत्वा पुराणं ह्येतदुत्तमम् ॥ २२
माघे मासि प्रयागे तु स स्नानफलमाप्नुयात्।
यो भक्त्या श्रावयेद्भक्तान्रित्यं नरहरेरिदम् ॥ २३
सर्वतीर्थफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते।
जो मनुष्य पवित्र होकर इस उत्तम पुराणका श्रवण करता है, वह माघ मासमें प्रयागतीर्थमें स्नान करनेका फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य इस नरसिंहपुराणको भगवान्के भक्तोंके प्रति नित्य सुनाता है, वह सम्पूर्ण तीर्थोंके सेवनका फल प्राप्त करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ २२—२३१/२॥

श्रुत्वैवं स्नातकौः सार्धं भरद्वाजो महामतिः ॥ २४
सूतमभ्यर्च्य तत्रैव स्थितवान् मुनयो गताः।
इस प्रकार स्नातकोंके साथ इस पुराणको सुन महामति भरद्वाजजीने सूतजीका पूजन-सत्कार किया और स्वयं वहीं रह गये। अन्य सब मुनि अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २४१/२॥

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