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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished318 pages

Page 312 of 318

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Page 312

अध्याय ६८ ] नरसिंहपुराणके पठन और श्रवणका फल ३०१
सर्वपापहरं पुण्यं पुराणं नृसिंहात्मकम्॥ २५
पठतां शृण्वतां नृणां नरसिंहः प्रसीदति।
प्रसन्ने देवदेवेशे सर्वपापक्षयो भवेत्॥ २६
प्रक्षीणपापबन्धास्ते मुक्तिं यान्ति नरा इति॥ २७
यह नरसिंहपुराण समस्त पापोंको हर लेनेवाला और
पुण्यमय है। जो इसको पढ़ते और सुनते हैं, उन
मनुष्योंपर भगवान् नरसिंह प्रसन्न होते हैं। देवदेवेश्वर
नरसिंहके प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जाता
है और जिनके पाप-बन्धन सर्वथा नष्ट हो गये हैं, वे
मानव मोक्षको प्राप्त होते हैं॥ २५-२७॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे मानसतीर्थव्रतं नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः॥ ६७॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मानसतीर्थ-व्रत' नामक सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६७॥
अड़सठवाँ अध्याय
नरसिंहपुराणके पठन और श्रवणका फल
सूत उवाच
सूतजी कहते हैं- इस प्रकार मैंने यह सम्पूर्ण
नरसिंहपुराण कह सुनाया। यह सब पापोंको हरनेवाला
और सम्पूर्ण दुःखोंको दूर करनेवाला है। समस्त
पुण्यों तथा सभी यज्ञोंका फल देनेवाला है। जो लोग
इसके एक श्लोक या आधे श्लोकका श्रवण अथवा
पाठ करते हैं, उन्हें कभी भी पापोंसे बन्धन नहीं प्राप्त
होता। भगवान् विष्णुको अर्पण किया हुआ यह पावन
पुराण समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला है। भरद्वाजजी!
जो लोग भक्तिपूर्वक इस पुराणका पाठ अथवा श्रवण
करते हैं, उनको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन सुनिये।
वे सौ जन्मोंके पापसे तत्काल ही मुक्त हो जाते हैं तथा
अपनी सहस्र पीढ़ियोंके साथ ही परमपदको प्राप्त होते
हैं। जो प्रतिदिन एकाग्रचित्तसे गोविन्दगुणगान सुनते रहते
हैं, उनको अनेक बार तीर्थ-सेवन, गोदान, तपस्या और
यज्ञानुष्ठान करनेसे क्या लेना है। जो प्रतिदिन सबेरे
उठकर इस पुराणके बीस श्लोकोंका पाठ करता है,
इत्येतत् सर्वमाख्यातं पुराणं नारसिंहकम्।
सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखनिवारणम्॥ १
समस्तपुण्यफलदं सर्वयज्ञफलप्रदम्।
ये पठन्त्यपि शृण्वन्ति श्लोकं श्लोकार्धमेव वा॥ २
न तेषां पापबन्धस्तु कदाचिदपि जायते।
विष्ण्वर्पितमिदं पुण्यं पुराणं सर्वकामदम्॥ ३
भक्त्या च वदतामेतच्छृण्वतां च फलं शृणु।
शतजन्मार्जितैः पापैः सद्य एव विमोचिताः॥ ४
सहस्त्रकुलसंयुक्ताः प्रयान्ति परमं पदम्।
किं तीर्थैर्गोप्रदानैर्वा तपोभिर्वा किमध्वरैः॥ ५
अहन्यहनि गोविन्दं तत्परत्वेन शृण्वताम्।
यः पठेत्प्रातरुत्थाय यदस्य श्लोकविंशतिम्॥ ६
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth