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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished318 pages

Page 310 of 318

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Page 310

अध्याय ६७] मानसतीर्थ, व्रत तथा नरसिंहपुराणका माहात्म्य २९९
मनोनिर्मलता तीर्थं रागादिभिरनाकुला।
सत्यं तीर्थं दया तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः॥ २
गुरुशुश्रूषणं तीर्थं मातृशुश्रूषणं तथा।
स्वधर्माचरणं तीर्थं तीर्थमग्नेरुपासनम्॥ ३
वास्तवमें राग-द्वेषादिसे रहित मनकी स्वच्छता ही उत्तम
तीर्थ है। सत्य, दया, इन्द्रियनिग्रह, गुरुसेवा, माता-
पिताकी सेवा, स्वधर्मपालन और अग्निकी उपासना—
ये परम उत्तम तीर्थ हैं। यह तो पावन तीर्थोंका वर्णन
हुआ, अब व्रतोंका वर्णन सुनिये॥१-३१/२॥
एतानि पुण्यतीर्थानि व्रतानि शृणु मेऽधुना।
एकभुक्तं तथा नक्तमुपवासं च वै मुने॥ ४
मुने! दिन-रातमें एक बार भोजन करके रहना
और विशेषतः रातमें भोजन न करना—यह व्रत है।
पूर्णिमा और अमावास्याको एक ही बार भोजन करके
रहना चाहिये। इन तिथियोंमें एक बार भोजन करके
रहनेवाला मनुष्य पावन गतिको प्राप्त करता है। जो
चतुर्थी, चतुर्दशी, सप्तमी, अष्टमी और त्रयोदशीको
रातमें उपवास करता है, उसे मनोवाञ्छित वस्तुकी
प्राप्ति होती है॥४-६॥
पूर्णमास्याममावास्यामेकभुक्तं समाचरेत्।
तत्रैकभुक्तं कुर्वाणः पुण्यां गतिमवाप्नुयात्॥ ५
चतुर्थ्यां तु चतुर्दश्यां सप्तम्यां नक्तमाचरेत्।
अष्टम्यां तु त्रयोदश्यां स प्राप्नोत्यभिवाञ्छितम्॥ ६
उपवासो मुनिश्रेष्ठ एकादश्यां विधीयते।
नरसिंहं समभ्यर्च्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७
मुनिश्रेष्ठ! एकादशीको दिन-रात उपवास करनेका
विधान है। उस दिन भगवान् विष्णुका पूजन करके
मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यदि हस्त
नक्षत्रसे युक्त रविवार हो तो उस दिन रात्रिमें उपवास
करके सौरनक्त-व्रतका पालन करना चाहिये। उस
दिन स्नानके पश्चात् सूर्यमण्डलमें भगवान् विष्णुका
ध्यान करके मनुष्य रोगमुक्त हो जाता है। जब सूर्य
अपनी दुगुनी छायामें स्थित हों, उस दिन सौर नक्तव्रतका
समय है। उस समयसे लेकर राततक भोजन न
करे॥७-९॥
हस्तयुक्तेऽर्कदिवसे सौरनक्तं समाचरेत्।
स्नात्वार्कमध्ये विष्णुं च ध्यात्वा रोगात्प्रमुच्यते॥ ८
आत्मनो द्विगुणां छायां यदा संतिष्ठते रविः।
सौरनक्तं विजानीयान्न नक्तं निशि भोजनम्॥ ९
जो पुरुष बृहस्पतिवारको त्रयोदशी तिथि होनेपर
अपराह्नकालमें जलमें स्नान करके तिल और
तण्डुलोंद्वारा देवता, ऋषि एवं पितरोंका तर्पण करता
है तथा भगवान् नरसिंहका पूजन करके उपवास
करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें
प्रतिष्ठित होता है॥ १०-११॥
गुरुवार त्रयोदश्यामपराह्ने जले ततः।
तर्पयित्वा पितृन्देवानृषींश्च तिलतण्डुलैः॥ १०
नरसिंहं समभ्यर्च्य यः करोत्युपवासकम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥ ११
महामुने! जब अगस्त्य तारेका उदय हो,
उस समयसे लगातार सात रात्रियोंतक अगस्त्य-
मुनिको पूजा करके उन्हें अर्घ्य देना चाहिये।
यदागस्त्योदये प्राप्ते तदा सप्तसु रात्रिषु।
अर्घ्यं दद्यात् समभ्यर्च्य अगस्त्याय महामुने॥ १२
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth