नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
DevanagariSanskritpublished304 pages
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- ऋणकर्ता को धर्म का भय दिखाना चाहिए, बेईमानी के दुष्परिणाम-
विनाश, नरक-प्राप्ति तथा लोकनिन्दा-आदि से परिचित कराना चाहिए। - व्यवहार दिखाना चाहिए, अर्थात् न्यायालय में मुक़द्दमा चलाने की धमकी
देनी चाहिए। उसे समझाना चाहिए कि इससे उसकी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा
मिट्टी में मिल जायेगी। - छल-प्रयोग-उसकी पत्नी, पुत्र को बहाने से बुलाकर बन्धक बना लेना,
उसकी सम्पत्ति को अपनी बताकर बेच देना, उसके किसी व्यापार धन्धे के लाभांश
पर अधिकार कर लेना, अथवा उसके किसी सम्बन्धी को देय धन रोक लेना
आदि-का आश्रय लेना चाहिए। - बल प्रयोग-मार पीट करना, उसकी पत्नी को छीन लेना, अपमानित
करना तथा उसे बन्दी बना लेना आदि-करना चाहिए।
इन चारों में क्रमशः पूर्व-पूर्व का, अर्थात् प्रथम धर्म-भय का उपयोग करना
चाहिए, उससे काम न चलने पर व्यवहार का, पुनः छल का और अन्त में बल का
प्रयोग करना चाहिए।
यः स्वकं साधयेदर्थमुत्तमर्णोऽधमर्णकात्।
न स राज्ञा निषेधव्य ऐहिकामुष्मिकार्थतः॥ 123 ॥
उत्तमर्ण द्वारा अधमर्ण से अपने ऋण की साम-दान आदि उपायों से वसूली
करना अधमर्ण के ही हित में है। इससे अधमर्ण को इस लोक में शान्ति और
परलोक में सद्गति मिलती है। अतः राजा अथवा राज्य प्रशासन को उत्तमर्ण धनी
का पक्षधर एवं सहायक बनना चाहिए, उसके द्वारा वसूली के लिए किसी भी
प्रयास में प्रशासन को आड़े नहीं आना चाहिए।
अधिक्रियत इत्याधिः स विज्ञेयो द्विलक्षणः।
कृतकालोपनेयश्च यावद्देयोयतस्तथा॥ 124 ॥
किसी चल-अचल सम्पत्ति-भवन, खेत, भू खण्ड अथवा दुकान अथवा
स्वभूमि अथवा बाण्ड, शेयर प्रमाण-पत्र आदि-को गिरवी रखकर लिया गया
ऋण आधि कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है - निर्धारित अवधि में लौटाया
जाने वाला तथा इच्छानुसार-अनिश्चित काल में-लौटाया जाने वाला।
निर्धारित अवधि में लौटाये जाने वाले ऋण के निर्दिष्ट काल में ही लौटाये
जाने पर ऋणी ऋणमुक्त होता है और अनिर्दिष्ट काल वाले ऋण को जब ऋणी
लौटाता है, तब वह ऋणमुक्त होता है। दोनों अवस्थाओं में ऋण की वापसी पाने पर
ही ऋणदाता को ऋणी को ऋण-पत्र लौटाना चाहिए।
स पुनर्द्विविधः प्रोक्तो गोप्यो भोग्यस्तथैव च।
उपचारस्तथैवास्य लाभहानिर्विपर्यये ॥ 125 ॥
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