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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 99 of 304

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Page 99

किसी वस्तु को बन्धक रखकर आधि—लिये गये ऋण—के उपयोग की
दृष्टि से दो प्रकार हैं—गोप्य, अर्थात् गुप्तरूप से रखे जाने वाले स्वर्णाभूषणों के क्रय
आदि में निवेश तथा भोग्य—उपभोग में आने वाले भवन, क्षेत्र आदि के क्रय में
निवेश।
यदि गोप्य का उपभोग किया जाता है, अर्थात् स्वर्णाभूषणों को अवसर
विशेष के स्थान पर सामान्य रूप से धारण किया जाता है और इधर भवन-क्षेत्र
आदि भोग्य सम्पत्ति का उपभोग न करके उसे छिपाकर रखा जाता है, अर्थात् क्षेत्र
को जोता-बोया नहीं जाता, तो ऋणकर्ता को लाभ के स्थान पर हानि ही होती है।
वह ऋण की मूलराशि को भी गंवाने की स्थिति में आ जाता है।
अभिप्राय यह है कि यदि ऋण लेकर स्वर्णाभूषण आदि ख़रीदे जाते हैं, तो
उन्हें सुरक्षित (गुप्त) रखना चाहिए और यदि भवन, क्षेत्र अथवा दुकान आदि की
ख़रीद की जाती है, तो उनका यथोचित उपभोग करना चाहिए। इसी में ऋण लेने
की सार्थकता है।
प्रमादाद्धनिनस्तद्वदाधौ विकृतिमागते।
विनष्टे मूलनाशः स्याद्दैवराजकृतादृते ॥ 126 ॥
ऋणदाता धनिक के पास बन्धक रखी वस्तु के चोरी हो जाने पर, घर के आग
लगने से भस्म हो जाने पर, जर्जर हो जाने पर तथा राज्य-प्रशासन द्वारा अपने
अधिकार में कर लिये जाने पर ऋणकर्ता को ऋण (मूलधन) तो देय ही होता है;
क्योंकि बन्धक वस्तु के विनाश में उसका कोई हाथ नहीं होता। हां, ऋणदाता
धनिक के प्रमाद से बन्धक वस्तु में विकार आ जाने पर अथवा नष्ट हो जाने पर,
उसे अपने मूलधन को वसूल करने का कोई अधिकार नहीं रहता। उस स्थिति में
वह अपने ऋणी के प्रति उत्तरदायी होता है।
न भोक्तव्यो बलादाधिर्भुञ्जानो वृद्धिमुत्सृजेत्।
मूल्येन तोषयेच्चैनमाधिस्तेनोऽन्यथा भवेत् ॥ 127 ॥
ऋणदाता को बन्धक रखी वस्तु का ऋणकर्ता की अनुमति के बिना स्वेच्छा
से अपने प्रयोग में लाने का कोई अधिकार नहीं। यदि बलपूर्वक अथवा छिपाकर
उपयोग किया जाता है, तो ऋणदाता को अपने ऋण पर ब्याज लेने का अधिकार
समाप्त हो जाता है। ऋणदाता धनिक को ऋणकर्ता के समक्ष सारी स्थिति स्पष्ट
करनी—अर्थात् बिना अनुमति के उपयोग करने की क्या आवश्यकता पड़ गयी
अथवा अनुमति की आवश्यकता नहीं समझी गयी आदि—पड़ती है। प्रत्येक
स्थिति में वस्तु के स्वामी को सन्तुष्ट करना ऋणदाता का कर्तव्य-कर्म है, अन्यथा
वह 'आधिस्तेन' कहलाता है और चोर के लिए निर्धारित दण्ड का पात्र बनता है।
नारदस्मृति / 97