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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 97 of 304

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Page 97

उपस्थानाय दानाय प्रत्ययाय तथैव च।
त्रिविधः प्रतिभूर्दृष्टस्त्रिष्वेवार्थेषु सूरिभिः ॥ 118 ॥
विधिवेत्ता अर्थशास्त्रियों के अनुसार ऋण पर धन-राशि के लेन-देन के
सम्बन्ध में तीन ही प्रतिभू (ज़ामिन) हो सकते हैं— 1. स्वयं ऋणकर्ता व्यक्ति की
विश्वसनीयता होना, 2. ऋणकर्ता व्यक्ति का कोई समर्थ एवं सम्मानित मित्र अथवा
सम्बन्धी—ऋणी के ऋण न लौटाने पर उसके स्थान पर स्वयं उसके ऋण को
चुकाने के लिए वचनबद्ध तथा 3. बन्धक रखी वस्तु।
ऋणिष्वप्रतिकुर्वत्सु प्रत्यये वापि हापिते।
प्रतिभूस्तदृणं दद्यादनुपस्थापयंस्तथा ॥ 119 ॥
कुछ बन्धक न रखकर ऋणी के समर्थ सम्मानित मित्र अथवा सम्बन्धी द्वारा
भुगतान के दायित्व के आश्वासन पर दिये गये ऋण का ऋणी द्वारा भुगतान न किये
जाने पर प्रतिभू को ऋणदाता के मूलधन और ब्याज का भुगतान करना ही होता है।
वह ऐसा करने को बाध्य होता है। अतः उसे प्रतिभू बनने से पूर्व इस वास्तविकता
को भली प्रकार समझ लेना चाहिए।
बहवश्चेत् प्रतिभुवो दद्युस्तेऽर्थं यथाकृतम्।
अर्थे विशेषिते ह्येषु धनिनश्छन्दतः क्रिया ॥ 120 ॥
यदि ऋणकर्ता को ऋण दिलाते समय उसकी वापसी का दायित्व लेने वाले
एक से अधिक प्रतिभू हों, तो ऋणकर्ता द्वारा ऋण न लौटाने की स्थिति में उन सब
को बराबर-बराबर अपने भाग की ऋण-राशि का भुगतान करना चाहिए अथवा
यदि उन्होंने पहले कुछ न्यूनाधिक भाग अथवा प्रतिशत का समझौता कर रखा है,
तो उसके अनुसार भुगतान करना चाहिए।
यमर्थं प्रतिभूर्दद्याद्धनिकेनोपपीडितः।
ऋणिकस्तं प्रतिभुवे द्विगुणं प्रतिदापयेत् ॥ 121 ॥
यदि धनी व्यक्ति किसी की आवश्यकता की पूर्ति के लिए स्वयं दुखी होकर
अपनी किसी आवश्यकता—लड़के की पढ़ाई, लड़की का विवाह, सम्पत्ति का
क्रय, पत्नी के लिए आभूषण बनवाना आदि—को काटकर ऋणकर्ता के लिए ऋण
की व्यवस्था करता है, तो ऋणकर्ता को धनी से लिये ऋण का दुगुना करके उसे
लौटाना चाहिए।
धर्मेण व्यवहारेण छलेनाचरितेन च।
प्रयुक्तं साधयेदर्थं पञ्चकेन बलेन च ॥ 122 ॥
यदि ऋणकर्ता ऋण लेने के उपरान्त लौटाने का नाम नहीं लेता, बेईमान हो
जाता है या धूर्तता पर उतर जाता है, तो ऋणदाता धनी को निम्नोक्त चार उपाय करने
चाहिए—
नारदस्मृति / 95