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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 30 of 304

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Page 30

टिप्पणी—असहाय भाष्यकार ने इस पद्य के अनुरूप अपना मत इस प्रकार
व्यक्त किया है—आगमः सम्बन्धः । तत्तदृणादानाद्यष्टादशपदानां मध्ये
कतमदिदं व्यवहारपदम्, तस्यापि मध्ये कतमोऽयं तदीयशाखाभेद इति
व्यवहारस्य नाम करणीयम्। ततस्तस्य चतुष्पादक्रियानिर्वाहादिका व्याधेरेव
चिकित्सा करणीया। ततः प्रमाणपरीक्षानुसारेण तस्य व्यवहारस्य निर्णयः
कार्य इति व्यवहारदर्शनं स्याच्चतुर्विधम्।
‘व्यवहार कल्पतरु’ के अनुसार आगम का अर्थ उत्तर प्रत्युत्तर को लिपिबद्ध
करना तथा चिकित्सा का अर्थ उत्तर प्रत्युत्तर पर विचार करना है—आगमः
भाषोत्तरयोः श्रुत्वा लेखनम्। चिकित्सा विचारणा।
धर्मशास्त्रार्थशास्त्राभ्यामविरोधेन यत्नतः ।
सम्पश्यमानो निपुणं व्यवहारगतिं नयेत् ॥ 37 ॥
धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र में निपुण राजा को किसी के प्रति पक्षपात—
अनुग्रह अथवा विरोध—का भाव न दिखाते हुए तथा अत्यन्त सावधान होकर और
मूल तथ्यों तक पहुंचने के लिए कठोर श्रम करते हुए ही, प्रत्येक व्यवहार का
निरपेक्ष भाव से निरीक्षण-परीक्षण करना चाहिए।
टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार—कभी कभी कहीं पर धर्मशास्त्रोक्त
अर्थशास्त्र के विरुद्ध और अर्थशास्त्रोक्त धर्मशास्त्र के विरुद्ध मिलता है। ऐसी
स्थिति में राजा को लोकाचार और अपने विवेक का आश्रय लेना चाहिए। इसके
अतिरिक्त न्यायविदों से भी परामर्श करना चाहिए, परन्तु लोकाचार के विरुद्ध कभी
नहीं जाना चाहिए।
किञ्चिद्धर्मशास्त्रोक्तमर्थशास्त्रविरुद्धं भवति। किञ्चित्पुनरर्थशास्त्रोक्तं
धर्मशास्त्रविरुद्धं भवति। तयोरितेरेतरतारतम्यालोचनेन यथा लोकाचारविरुद्धं
न भवति तथा ससभ्योऽपि राजा व्यवहारगतिं नयेत्।
याज्ञवल्क्य ने भी अपनी स्मृति में लोकाचार को महत्त्व देते हुए लिखा है—
यद्यपि शिष्टं लोकविरुद्धं नाचरणीयम् न करणीयम्।
यथा मृगस्य विद्धस्य व्याधे मृगपदं नयेत् ।
कक्षे शोणितपादेन तथा धर्मपदं नयेत् ॥ 38 ॥
जिस प्रकार व्याध अपने बाण से क्षत-विक्षत होकर भाग गये मृग के शरीर
से बहते और पृथ्वी पर गिरे रक्त को देखता हुआ उसकी खोज करता है, उसी प्रकार
धर्म व्यवहार के आसन पर प्रतिष्ठित राजा को प्रत्येक व्यवहार के प्रत्येक चरण की
गहन समीक्षा परीक्षा और उपलब्ध प्रमाणों-साक्ष्यों के निरीक्षण-परीक्षण के द्वारा
सत्य पर पहुंचने और वादी को न्याय दिलाने का प्रयास करना चाहिए।
28 / नारदस्मृति