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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 29 of 304

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धर्मशास्त्रं पुरस्कृत्य प्राड्विवाकमते स्थितः।
समाहितमतिः पश्येद् व्यवहाराननुक्रमात् ॥ 35 ॥
राजा को व्यवहार की परीक्षा करते समय निम्नोक्त तीन तथ्यों को पर्याप्त
महत्त्व एवं गौरव देना चाहिए—
प्रथम, धर्मशास्त्र (आचार संहिता Penal Code) में निर्धारित नियम, विनियम
एवं विधान।
द्वितीय, क़ानूनवेत्ता न्यायाधिकारियों अथवा वकीलों द्वारा धर्मशास्त्र के आधार
पर निर्धारित मत।
तृतीय, अपनी बुद्धि को शान्त-संयत रखते हुए वादी-प्रतिवादियों से पूछे
गये प्रश्नों के उत्तरों से प्राप्त सत्य।
इन्हीं तीन तत्त्वों को आधार बनाकर राजा अथवा राज-प्रतिनिधि को एक के
उपरान्त दूसरे व्यवहार को देखना-परखना चाहिए।
टिप्पणी-मनु ने राजा की व्यस्तता को देखते हुए अपने स्थान पर प्रतिनिधि
नियुक्त करने का अधिकार दिया है—
यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम्।
यदा नियुञ्ज्याद् विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने ॥
आगमः प्रथमं कार्यों व्यवहारपदं ततः।
चिकित्सा निर्णयश्चैव दर्शनं स्याच्चतुर्विधम् ॥ 36 ॥
व्यवहार-प्रक्रिया के चार पक्ष होते हैं—
प्रथम, किसी व्यवहार के स्वीकृत (Admit) होने के लिए विषय से सम्बद्ध
कोई लिखित प्रमाण होना चाहिए। इसी का नाम आगम है। इसी के अन्तर्गत
वर्गीकरण है, अर्थात् विवाद किस वर्ग के अन्तर्गत है, अर्थात् क्या वह लेन-देन
सम्बन्धी, अर्थात् दीवानी (Civil Suits) अथवा अपराध सम्बन्धी, अर्थात् फ़ौजदारी
(Criminal) है। इन सब तथ्यों का निर्धारण भी आगम के अन्तर्गत आता है।
द्वितीय, व्यवहार संज्ञा पाने के उपरान्त व्यवहार का द्वितीय चरण है—
उसका लिखित उत्तर-प्रत्युत्तर। आज की भाषा में इसे दावा-जवाबदावा कहा जाता
है। इसी का नाम प्रचलन है।
तृतीय, वादी अथवा पक्षी द्वारा लिखित दावा—विपक्षी द्वारा जवाब देना—
पक्षी द्वारा वापसी जवाबदावा तथा प्रतिरक्षी द्वारा फिर से जवाबदावा आदि प्रक्रिया
के उपरान्त मौखिक (face-to-face) प्रश्नोत्तर (बयान) तथा बहस (Argument)
आदि तृतीय चरण है—इसी का नाम क्रिया अथवा चिकित्सा है।
चतुर्थ, चिकित्सा के परिणाम के रूप में दिया जाने वाला निर्णय फ़ैसला
(judgment) चतुर्थ चरण है—इसी का पारिभाषिक नाम दर्शन है।
नारदस्मृति / 27