नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextयत्र विप्रतिपत्तिः स्याद्धर्मशास्त्रार्थशास्त्रयोः ।
अर्थशास्त्रोक्तमुत्सृज्य धर्मशास्त्रोक्तमाचरेत् ॥ ३९॥
व्यवहार का निर्णय करते समय अथवा अपराधी को दण्डित करने के समय
अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र में मतभेद मिलने की स्थिति में राजा को अर्थशास्त्र के मत
की अपेक्षा धर्मशास्त्र के कथन को ही वरीयता एवं मान्यता देनी चाहिए। वस्तुतः
अर्थशास्त्र के किसी भी सिद्धान्त की धर्मशास्त्रसम्मत होने पर ही मान्यता एवं
प्रामाणिकता है। धर्मशास्त्र के विरुद्ध तो किसी भी अन्य शास्त्र के किसी भी कथन
का कोई महत्त्व ही नहीं है।
टिप्पणी—याज्ञवल्क्य भी इसी मत का समर्थन करते हुए अपनी स्मृति में
लिखते हैं—अर्थशास्त्रात्तु बलवद् धर्मशास्त्रमिति स्थितिः ।
व्यवहारमातृकाकार का भी यही मत है—अस्मिन्नप्यर्थशास्त्रे धर्मशास्त्रा-
विरुद्धोयोंऽशः स उपादेयः । इतरस्तु परित्याज्यः ।
असहाय भाष्यकार भी धर्मशास्त्र को वरीयता देते हुए लिखते हैं—
यदा व्यवहारस्य निर्णयदानकाले तथा दण्डनिगमनावसरे सर्वशास्त्रोक्ता
महती लघ्वी वा आकोटना दृश्यते । धर्मशास्त्रोक्ता चान्यादृशाकारा दृश्यते ।
तदा तयोः शास्त्रयोः परस्परं विप्रतिपत्तौ विसंवादे अर्थशास्त्रोक्तमुत्सृज्य
धर्मशास्त्रोक्तमेवाचरेत् ।
धर्मशास्त्रविरोधे तु युक्तियुक्तो विधिः स्मृतः ।
व्यवहारो हि बलवान् धर्मस्तेनावहीयते ॥ ४० ॥
विभिन्न धर्मशास्त्रों में परस्पर विरोध अथवा धर्मशास्त्र और लोक-व्यवहार
में मतभेद मिलने पर अपने विवेक से युक्ति-युक्त और तर्कसंगत का ग्रहण तथा शेष
अयुक्त का त्याग करना चाहिए। तर्क और युक्ति की संगति के लिए लोक-व्यवहार
को ही आधार बनाना चाहिए। शिष्ट जनों के आचार-व्यवहार को औचित्य की
कसौटी मानना चाहिए; क्योंकि धर्म के निर्णय के लिए इससे अधिक प्रामाणिक
और कोई आधार हो ही नहीं सकता। लोक-व्यवहार को शास्त्र से कहीं अधिक
गौरव देना चाहिए।
टिप्पणी—'श्रीमद्भगवद्गीता' में श्रेष्ठ पुरुष के आचरण का दूसरे लोगों
द्वारा अनुसरण किये जाने का उल्लेख हुआ है—
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
सः यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
शिष्ट जनों के आचरण-रूप लोक-व्यवहार की प्रामाणिकता की पुष्टि करते
हुए असहाय भाष्यकार का कथन है—यत्र पुनस्थार्पत्या विप्रतिंपत्तिः स्याद्धर्म-
नारदस्मृति / 29