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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 136 of 304

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दिव्य कर्म करने वाले के दोनों हाथों में पवित्र पीपल के सात पत्ते रखे जाते
हैं और उन पत्तों को सात धागों से बांधा जाता है।
जात्यैव लोहकारो यः कुशलश्चाग्निकर्मणि।
दृष्टयोगश्चान्यत्रापि तेनायोऽग्नौ प्रतापयेत्॥ 288 ॥
जाति से लोहार तथा अग्निकर्म में कुशल होने के अतिरिक्त पहले से इस
कार्य के अनुभवी-अभ्यस्त व्यक्ति को अग्नि में लोहे का गोला तैयार करने के लिए
नियुक्त करना चाहिए।
अग्निवर्णमयः पिण्डं सस्फुलिङ्गं सुरक्तिकम्।
पञ्चाशत्पलिकं भूयः कृत्वैवं तं शुचिर्द्विजः ॥ 289 ॥
लोहे के गोले को इतना अधिक तपाना चाहिए कि वह लाल हो जाये और
उससे चिंगारियां निकलने लगें। ऐसा हो जाने पर एक आचारनिष्ठ शुद्ध-पवित्र
ब्राह्मण को अभियुक्त को शपथपूर्वक सचेत करते हुए इस प्रकार कहना चाहिए—
तृतीयतापतातं तं ब्रूयात् सत्यपुरस्कृतः।
श्रूयतां मानवो धर्मो लोकपालैरधिष्ठितः ॥ 290 ॥
भद्र ! मैं तुम्हें सचेत करता हूं और यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि जितना
तुम समझते हो, उससे तीन गुना अधिक ताप इस लौहपिण्ड में विद्यमान है, अर्थात्
यह स्पर्शमात्र से दाहक है, परन्तु सत्यनिष्ठ के लिए शीतल है। इस सम्बन्ध में मनु
तथा लोकपालों द्वारा अधिष्ठित महर्षियों द्वारा निर्दिष्ट निरूपित सत्य को सुनो।
त्वमग्ने सर्वदेवानां पवित्रं परमं सुखम्।
त्वमेतत् सर्वभूतानां हृदिस्थो वेत्सि चेष्टितम् ॥ 291 ॥
सभी वेदवेत्ता महात्माओं का मानना है कि अग्नि सभी देवों का परम पवित्र
मुख है। वह सभी प्राणियों के मनोभावों, विचारों तथा चेष्टाओं का प्रत्यक्ष द्रष्टा एवं
ज्ञाता है।
सत्यानृते च जिह्वायास्त्वत्तः समुपजायते।
वेदादिभिरिदं प्रोक्तं नान्यथा कर्त्तुमर्हसि ॥ 292 ॥
जिह्वा से उच्चरित होने वाला सत्य तथा असत्य अग्निदेव से छिपा नहीं
रहता—वेदशास्त्रों का यह सर्वसम्मत मत है। अतः हे अग्निदेव ! इस अभियुक्त के
भी सच्चा-झूठा होने का निर्धारण आपको ही करना है।
अनेनायमिदं प्रोक्तो मिथ्या चेदमथाब्रवीत्।
सर्वथा च यथा मिथ्या तथाग्निं धारयाम्यहम् ॥ 293 ॥
हे अग्निदेव ! अभियोक्ता ने अभियुक्त को अपना अपराध स्वीकार करने के
लिए पर्याप्त समझाया-बुझाया है और आपसे अपनी वास्तविकता को छिपा न पाने
के प्रति भी भली प्रकार सतर्क किया है, फिर भी वह अपने हठ पर अडिग है और
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