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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 137 of 304

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Page 137

आपको (अग्नि को) धारण कर एवं साक्षी मानकर अपनी निर्दोषिता सिद्ध करने
के लिए उद्यत है।
एष धारयते च त्वां सत्येनानेन मानवः।
तदस्य सत्यवाक्यस्य शीतो भव हुताशन ॥ 294 ॥
हे अग्निदेव ! अभियुक्त अपनी निर्दोषिता को प्रमाणित करने के लिए आपको
धारण करने जा रहा है। यदि यह व्यक्ति सचमुच निर्दोष एवं शुद्ध चरित्र है, तो आप
अपनी दाहकता को त्याग कर शीतल हो जायें।
अमुमर्थं च पत्रस्थमभिलिख्य यथार्थतः।
श्रावितस्यैवं तन्मूर्ध्नि तस्य देयं यथाक्रमम् ॥ 295 ॥
उपर्युक्त प्रार्थना को यथार्थ में लिखकर अभियुक्त को और उपस्थित व्यक्तियों
को सुनाना चाहिए तथा प्रार्थना-पत्र को अभियुक्त के सिर पर बांध देना चाहिए।
तत्पश्चात् यथानिर्दिष्ट विधि से क्रमानुसार उसे लौहपिण्ड देना चाहिए।
स्नातश्च मण्डलस्थश्च ततः संगृह्य पावकम्।
स्थित्वैकस्मिन् ततोऽन्यानि व्रजेत् सप्त शनैःशनै ॥ 296 ॥
अभियुक्त को स्नान-ध्यान के उपरान्त एक मण्डल पर खड़ा हो जाना चाहिए
और फिर हाथ में लौहपिण्ड को धारण कर एक से दूसरे मण्डल पर धीरे-धीरे चल
कर-भागकर कदापि नहीं - आगे बढ़ना चाहिए।
पातयेन्न तमप्राप्य या भूमिः परिकल्पिता।
अष्टमं मण्डलं गत्वा ततोऽग्निं विसृजेन्नरः ॥ 297 ॥
एक मण्डल से दूसरे मण्डल पर जाने के लिए घेरी गयी धरती पर पैर बढ़ाते
समय लौहपिण्ड को फेंक नहीं देना चाहिए, अपितु पूरा समय, अर्थात् आठ
मण्डलों पर पहुंचने तक, लौहपिण्ड धारण किये रहना चाहिए। आठवें मण्डल पर
पहुंचने के उपरान्त ही लौहपिण्ड का विसर्जन करना चाहिए।
टिप्पणी - 'सरस्वती विलास' के अनुसार अभियुक्त को एक-एक मण्डल
पार करते समय हाथ पर बंधे पीपल के सात पत्तों को भी एक-एक कर फेंकते
जाना चाहिए। इस प्रकार एक-एक पत्ते के फेंकने को एक-एक परीक्षा में उत्तीर्णता
समझना चाहिए। आठवें मण्डल पर पहुंचना, निर्दोषिता की सिद्धि को सार्वजनिक
करना होगा।
यस्तु पातयते त्रासादग्धो वा न विभाष्यते।
पुनस्तं धारयेदग्निं स्थितिरेव दृढीकृता ॥ 298 ॥
भय से लौहपिण्ड को सहसा अथवा देर में फेंक देने वाला अथवा हाथ जला
बैठने वाला अभियुक्त वैसे तो अपराधी निर्णीत माना जाता है, फिर भी उसके
अनुरोध करने पर उसे एक बार फिर अपने को निर्दोष सिद्ध करने का अवसर देना
नारदस्मृति / 135