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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 135 of 304

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Page 135

रक्षा आपके ही हाथ में है। मैं आपका शरणागत हूं, मेरा उद्धार करो।
इत्यादि कृतश्रावणं लोकपालैः सुरैश्च वै।
पुरुषं पुनरारूढं समुद्धृत्य निरीक्षयेत ॥ 282 ॥
इस प्रकार अभियुक्त द्वारा तुलादेव के अतिरिक्त दिक्पालों और लोकपालों की
प्रार्थना करने के उपरान्त उसे तुला के पलड़े में बिठाना चाहिए और फिर पलड़े के
उठने-न उठने को देखना-परखना चाहिए।
तुलिता यदि वर्धेत स शुद्धः स्यान्न संशयः ।
समो वा हीयमानो वा अविशुद्धो भवेन्नरः ॥ 283 ॥
तुला के दूसरे पलड़े में रखी शिला के भार से अभियुक्त के पलड़े के ऊपर
उठ जाने पर उसे असन्दिग्ध रूप से सर्वथा निर्दोष एवं निष्पाप मानना चाहिए।
इसके विपरीत अभियुक्त वाले पलड़े के शिला वाले पलड़े के बराबर अथवा नीचे
रहने पर उसे अशुद्ध-पापकर्ता घोषित करना चाहिए।
कक्षाच्छेदे तुलाभङ्गे घटकर्कटयोस्तथा।
रज्जुच्छेदेऽक्षभङ्गे च मूर्तितः शुद्धिमादिशेत् ॥ 284 ॥
तुला के आधार (दोनों पलड़ों को थामने वाला साधन-लकड़ी, लौह आदि)
के चटक जाने पर, पलड़ों के चरमरा जाने पर, शिलाखण्ड के गिर-टूट जाने पर,
रस्सी अथवा श्रृंखला के छिन्न-भिन्न हो जाने पर तथा खम्भों के गिर जाने पर
अभियुक्त को निर्दोष समझना चाहिए। इनमें किसी के भी टूटने-फूटने अथवा
गिरने-चटकने का अर्थ अभियुक्त को तोलने के रूप में अपमानित न होने देना है।
तुलादेव, लोकपालों एवं दिक्पालों को यह सब सहज-स्वीकार्य नहीं है।
अतः परं प्रवक्ष्यामि विधिमग्नेस्तथोत्तमम् ।
द्वात्रिंशदङ्गुलं प्राहुर्मण्डलान्मण्डलान्तरम् ॥ 285 ॥
अब हम तुला दिव्य के उपरान्त अग्नि दिव्य की विधि का वर्णन करेंगे। यहां
संक्षेप में इतने कथन को पर्याप्त समझना चाहिए कि एक मण्डल से दूसरे मण्डल
की दूरी बत्तीस अंगुल होती है।
अष्टभिर्मण्डलैरवमङ्गुलानां शतद्वयम् ।
षट्पञ्चाशत्समधिकं भूमेस्तु परिकल्पना ॥ 286 ॥
दो सौ छप्पन अंगुलियों की परिसीमा-कनिष्ठिका अंगुलियों को अंगूठे तक
फैलाया जाये, तो उसका विस्तार लगभग एक फुट होगा। इस प्रकार दो सौ छप्पन
विस्तार का अर्थ लगभग पचासी गज़ लम्बी और पचासी गज़ चौड़ी धरती का
घेराव होगा-में आठ मण्डलों का निर्माण करना चाहिए।
सप्ताश्वत्थस्य पत्राणि अभियुक्तस्य हस्तयोः ।
कृत्वा न्यसेत्तु पत्राणि सप्तभिः सूत्रतन्तुभिः ॥ 287 ॥
नारदस्मृति / 133