Skip to content
SarvaKosh
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 104 of 304

Read in context
Page 104

से पूछताछ करने से, अक्षरों की बनावट से, मुद्राचिह्न से, स्याही और काग़ज़ के
रूप-रंग से तथा ऋणदाता से किये गये प्रश्नोत्तरों से वास्तविकता का निर्णय करना
चाहिए।
लेख्यं यच्चान्यनामाङ्कं हेत्वन्तरकृतं भवेत्।
विप्रत्यये परीक्ष्यं तत् सम्बन्धागमहेतुभिः ॥ 144 ॥
किसी भी भूल-चूक, छल धोखा अथवा धूर्ततावश, दस्तावेज़ में लेने-देने
वाले के नाम ग़लत लिखे जाने पर अथवा एक दूसरे पर विश्वास न रहने पर
ऋण-पत्र की प्रामाणिकता की परीक्षा के निम्नरोक्त तीन आधार हैं—

  1. सम्बन्ध—किस प्रयोजन—यज्ञ, विवाह, भवन-क्रय आदि—के लिए
    ऋण लिया गया और उस धन का कहां उपयोग हुआ।
  2. आगम—यदि ऋण नहीं लिया गया, तो क्रय, विवाह अथवा स्वर्णाभूषणों
    के लिए धन की व्यवस्था का कौन-सा स्रोत था, पैसा कहां से आया ?
  3. हेतु—अविश्वास का अथवा ऋण लेकर उससे नकारने का कारण क्या
    है ? मन में उत्पन्न बेईमानी का आधार क्या है ?
    उपर्युक्त तीनों तथ्यों के आधार पर जांच-परख करने पर सत्य उभरकर
    सामने आ ही जाता है।
    लिखितं लिखितेनैव साक्षिमत् साक्षिभिर्हरेत्।
    साक्षिभ्यो लिखितं श्रेयो लिखितान्न तु साक्षिणः ॥ 145 ॥
    लिखा-पढ़ी किये बिना साक्षियों की उपस्थिति में लेन-देन करने और लेने
    वाले की अथवा देने वाले की नीयत में खोट आ जाने पर अथवा संशय उपस्थित
    हो जाने पर साक्षियों को ही विवाद का निपटारा करना चाहिए। उन्हें अपने निजी
    प्रभाव से ग़लत व्यक्ति को सही मार्ग दिखाना चाहिए। साक्षी प्रमाण की अपेक्षा
    लिखित प्रमाण की वैधता अधिक है। साक्षियों की उपस्थिति में लेन-देन करने में
    सुविधा तो हो सकती है, परन्तु लिखित प्रमाण की अपेक्षा साक्ष्य को वरीयता नहीं
    दी जा सकती।
    छिन्नभिन्नहतोन्मृष्टनष्टदुर्लिखितेषु च।
    कर्तव्यमन्यल्लेख्यं स्यादेष लेख्यविधिः स्मृतः ॥ 146 ॥
    लिखित पत्र के कट जाने पर, फट जाने पर, खण्डित टुकड़े हो जाने पर,
    चुराये जाने पर, मुचुड़ जाने पर, खो जाने पर, कहीं रखकर भूल जाने पर तथा जर्जर
    हो जाने पर दूसरा ऋण-पत्र तैयार किया जाना चाहिए। यही शास्त्र का विधान है।
    टिप्पणी—आजकल तो प्रतिलिपि रखने की प्रथा है, अतः उसके आधार
    पर नवीकरण कोई समस्या ही नहीं है। इसके अतिरिक्त चित्र प्रतिलिपि (Zerox
    Copy) की सुविधा ने सारा मामला ही सुलझा दिया है।
    102 / नारदस्मृति