संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 626 of 770
Read in context६२४ * संक्षिप्त नारदपुराण *
राजा रुक्माङ्गद तत्काल वहाँ जानेको उद्यत हुए। उनके मुखपर प्रसन्नता छा गयी। उन्होंने महलमें प्रवेश करके देखा, मोहिनी पलंगपर सो रही है। उसके शरीरसे तपाये हुए सुवर्णकी-सी प्रभा फैल रही है और उस बालाकी महारानी संध्यावली धीरे-धीरे सेवा कर रही हैं। प्रचुर दक्षिणा देनेवाले राजा रुक्माङ्गदको शय्याके समीप आया देख सुन्दरी मोहिनीका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उसने राजासे कहा—'प्राणनाथ ! कोमल बिछौनोंसे युक्त इस पलंगपर बैठिये। जो मानव दूसरे-दूसरे कार्योंमें आसक्त होकर अपनी युवती भार्याका सेवन नहीं करता, उसकी वह भार्या कैसे रह सकती है? जिसका दान नहीं किया जाता, वह धन भी चला जाता है, जिसकी रक्षा नहीं की जाती, वह राज्य अधिक कालतक नहीं टिक पाता और जिसका अभ्यास नहीं किया जाता, वह शास्त्रज्ञान भी टिकाऊ नहीं होता। आलसी लोगोंको विद्या नहीं मिलती। सदा व्रतमें ही लगे रहनेवालोंको पत्नीकी प्राप्ति नहीं होती। पुरुषार्थके बिना लक्ष्मी नहीं मिलतीं। भगवान्की भक्तिके बिना यशकी प्राप्ति नहीं होती। बिना उद्यमके सुख नहीं मिलता और बिना पत्नीके संतानकी प्राप्ति नहीं होती। अपवित्र रहनेवालेको धर्म-लाभ नहीं होता। अप्रिय वचन बोलनेवाला ब्राह्मण धन नहीं पाता। जो गुरुजनोंसे प्रश्न नहीं करता, उसे तत्त्वका ज्ञान नहीं होता तथा जो चलता नहीं, वह कहीं पहुँच नहीं सकता। जो सदा जागता रहता है, उसे भय नहीं होता। भूपाल ! प्रभो ! आप राज्यकाजमें समर्थ पुत्रके होते हुए भी मुझे धर्माङ्गदके सुन्दर महलमें अकेली छोड़ राजका कार्य क्यों देखते हैं?' तब राजा रुक्माङ्गद उसे सान्त्वना देते हुए बोले।
धर्माङ्गदका माताओंसे पिता और मोहिनीके प्रति उदार होनेका अनुरोध तथा पुत्रद्वारा माताओंका धन-वस्त्र आदिसे समादर
राजाने कहा—भीरु ! मैंने राजलक्ष्मी तथा राजकीय वस्तुओंपर पुनः अधिकार नहीं स्थापित किया है। मैंने धर्माङ्गदको पुकारकर यह आदेश दिया था कि 'कमलनयन ! तुम मोहिनीको सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित अपने महलमें ले जाओ और इसकी सेवा करो; क्योंकि यह मेरी सबसे प्यारी पत्नी है। तुम्हारा महल हवादार भी है और उसमें हवासे बचनेका भी उपाय है। वह सभी ऋतुओंमें सुख देनेवाला है, अतः वहीं ले जाओ।' पुत्रको इस प्रकार आदेश देकर मैं कष्टसे बचनेके लिये बिछौनेपर गया। शय्यापर पहुँचते ही मुझे नींद आ गयी और अभी-अभी ज्यों ही जगा हूँ, सहसा तुम्हारे पास चला आया हूँ। देवि ! तुम जो कुछ भी कहोगी, उसे निस्संदेह पूर्ण करूँगा।
मोहिनी बोली—राजेन्द्र ! मेरे विवाहसे अत्यन्त दुःखित हुई इन अपनी पत्नियोंको धीरज बँधाओ। इन पतिव्रताओंके आँसुओंसे दग्ध होनेपर मेरे मनमें क्या शान्ति होगी? भूपाल ! ये पतिव्रता देवियाँ तो मेरे पिता ब्रह्माजीको भी भस्म कर सकती हैं। फिर आप-जैसे प्राकृत नरेशको और मेरी-जैसी स्त्रीको जला देना इनके लिये कौन बड़ी बात है? भूमिपाल ! महारानी संध्यावलीके समान नारी तीनों लोकोंमें कहीं नहीं है। इनका एक-एक अङ्ग आपके स्नेहपाशसे बँधा हुआ है; इसीलिये ये मुझे बड़े प्यारसे षड्रस भोजन कराती हैं और आपके ही गौरवसे मुझे प्रिय लगनेवाली मीठी-मीठी बातें सुनाती हैं। इन्हींके स्वभावकी सैकड़ों देवियाँ आपके घरकी शोभा बढ़ा रही हैं। महीपते ! मैं कभी इन सबके चरणोंकी धूलके बराबर भी नहीं हो सकती।