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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 627 of 770

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Page 627

* उत्तरभाग * ६२५


पुत्रके साथ खड़ी हुई जेठी रानीके समीप मोहिनीका यह वचन सुनकर राजा रुक्माङ्गद बहुत लज्जित हुए। तब धर्माङ्गदने कहा—'माताओ! मेरे पिताको मोहिनीदेवी तुम सबसे अधिक प्रिय है। वे मन्दराचलके शिखरसे उस बालाको अपने साथ क्रीडाके लिये ले आये हैं। (अतः ईर्ष्या छोड़कर तुम सब लोग पिताके सुखमें योग दो।)'

पुत्रकी यह बात सुनकर सब माताएँ बोलीं—'बेटा! तुम्हारे न्याययुक्त वचनका पालन हम अवश्य करेंगी।'

माताओंकी यह बात सुनकर राजकुमार धर्माङ्गदने प्रसन्नचित्तसे एक-एकके लिये एक-एक करोड़से अधिक स्वर्णमुद्राएँ, हजार-हजार नगर और गाँव तथा आठ-आठ सुवर्णमण्डित रथ प्रदान किये। एक-एक रानीको उन्होंने दस-दस हजार बहुमूल्य वस्त्र दिये, जिनमेंसे प्रत्येकका मूल्य सौ स्वर्णमुद्रासे अधिक था। मेरुपर्वतकी खानसे निकले हुए शुद्ध एवं अक्षय सुवर्णकी ढाली हुई एक-एक लाख मुद्राएँ उन्होंने प्रत्येक माताको अर्पित कीं। साथ ही एक-एकके लिये सौसे अधिक दासियाँ भी दीं। घड़ेके समान थनवाली दस-दस हजार दुधारू गायें और एक-एक हजार बैल भी दिये। तदनन्तर भक्तिभावसे राजकुमारने सभी माताओंको एक-एक हजार सोनेके आभूषण दिये, जिनमें हीरे जड़े हुए थे। आँवले बराबर मोतीके बने हुए प्रकाशमान हारोंकी कई ढेरियाँ लगाकर उन माताओंको दे दीं। सभीको पाँच-पाँच या सात-सात वलय (कड़े) भी दिये। महीपते! महारानी संध्यावलीके पास चन्द्रमाके समान चमकीले ढाई सौ मोतीके हार थे। धर्माङ्गदने एक-एक माताको दो-दो मनोहर हार दिये। प्रत्येकको चौबीस सौ सोनेकी थालियाँ और इतने ही घड़े प्रदान किये। राजन्! हर एक माताके लिये सौ-सौ सुन्दर पालकियाँ और उनके ढोनेवाले मोटे-ताजे शीघ्रगामी कहार दिये। इस प्रकार कुबेरके समान शोभा पानेवाले उस धन्य राजकुमारने बहुत-सी माताओंको बहुत-सा धन देकर उन सबकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर यह वचन कहा—'माताओ! मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करता हूँ। आप सब लोग मेरे अनुरोधसे पतिके सुखकी इच्छा रखकर मेरे पितासे आज ही चलकर कहें कि—'नरेश्वर! ब्रह्मकुमारी मोहिनी बड़ी सुशीला हैं। आप इनके साथ सैकड़ों वर्षोंतक सुखसे एकान्तमें निवास करें।'

पुत्रका यह वचन सुनकर सबके शरीरमें हर्षातिरेकसे रोमाञ्च हो आया। उन सबने महाराजसे जाकर कहा—'आर्यपुत्र! आप ब्रह्मकुमारी मोहिनीके साथ दीर्घकालतक निवास करें। आपके पुत्रके तेजसे हमारी हार्दिक भावना दुःखरहित हो गयी है, इसलिये हमने आपसे यह बात कही है। आप इसपर विश्वास कीजिये।'