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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 625 of 770

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Page 625
  • उत्तरभाग * ६२३

संध्यावलीका मोहिनीको भोजन कराना और धर्माङ्गदके मातृभक्तिपूर्ण वचन

धर्माङ्गद कहते हैं—'माँ! इस बातपर विचार करके मोहिनीको भोजन कराओ। ऐसा धर्म तीनों लोकोंमें कहीं नहीं मिलेगा। श्रेष्ठ वर्णवाली माताजी! पिताको सुख पहुँचाना ही हम दोनोंका कर्तव्य है। इससे इस लोकमें हमारे पापोंका भलीभाँति नाश होगा और परलोकमें अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति होगी।

पुत्रकी यह बात सुनकर देवी संध्यावलीने उसके साथ कुछ विचार-विमर्श किया। फिर पुत्रको बार-बार हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघा और इस प्रकार कहा—'बेटा! तुम्हारी बात धर्मसे युक्त है। अतः मैं उसका पालन करूँगी। ईर्ष्या और अभिमान छोड़कर मोहिनीको अपने हाथसे भोजन कराऊँगी। बेटा! व्रतराज एकादशीके अनुष्ठानसे तुझ-जैसा पुत्र मुझे प्राप्त हुआ है। लोकमें ऐसा लाभदायक व्रत दूसरा नहीं देखा जाता। यह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला तथा तत्काल फल देकर अपने प्रति विश्वास बढ़ानेवाला है। शोक और संताप देनेवाले अनेक पुत्रोंके जन्मसे क्या लाभ? समूचे कुलको सहारा देनेवाला एक ही पुत्र श्रेष्ठ है, जिसके भरोसे समस्त कुल सुख-शान्तिका अनुभव करता है*। तुम्हें अपने गर्भमें पाकर मैं तीनों लोकोंसे ऊपर उठ गयी। पुत्र! तुम शूरवीर, सातों द्वीपोंके अधिपति तथा पिताके आज्ञापालक हो एवं पिता और माता दोनोंको आह्लाद प्रदान करते हो। ऐसे पुत्रको ही विद्वानोंने पुत्र कहा है। दूसरे सभी नाममात्रके पुत्र हैं।'

ऐसा वचन कहकर उस समय देवी संध्यावलीने षड्रस भोजन रखनेके लिये पात्रोंकी ओर दृष्टिपात किया। राजन्! उसकी दृष्टि पड़नेमात्रसे वे सभी पात्र उत्तम भोजनसे भर गये। महीपते! मोहिनीको भोजन करानेके लिये कुछ-कुछ गरम और षड्रसयुक्त भोजनकी तथा अमृतके समान स्वादिष्ट जलकी व्यवस्था हो गयी। तदनन्तर रत्नजटित सुवर्णमयी चम्मच लेकर मनोहर हास्यवाली रानी संध्यावलीने शान्तभावसे मोहिनीको भोजन परोसा। सोनेके चिकने पात्रमें, जिसमें उचितमात्रामें सब प्रकारका भोज्य पदार्थ रखा हुआ था, मोहिनी देवी सोनेके सुन्दर आसनपर बैठकर अपनी रुचिके अनुकूल सुसंस्कृत अन्न धीरे-धीरे भोजन करने लगी। उस समय धर्माङ्गदके द्वारा व्यजन डुलाया जा रहा था।

मोहिनीके भोजन कर लेनेके अनन्तर राजकुमारने उसे प्रणाम करके कहा—'देवि! इन संध्यावली देवीने मुझे तीन वर्षतक अपने गर्भमें धारण किया है तथा आपके पतिदेवके प्रसादसे पलकर मैं इतना बड़ा हुआ हूँ। मनोहर अङ्गोंवाली देवि! तीनों लोकोंमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे देकर पुत्र अपनी मातासे उऋण हो सके।'

पुत्र धर्माङ्गदके ऐसा कहनेपर मोहिनीको बड़ा आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगी—'जिसमें पिताकी सेवाका भाव है, उसके समान इस पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है। जो इस प्रकार गुणोंमें बढ़ा-चढ़ा है, उस धर्मात्मा पुत्रके प्रति मैं माता होकर कैसे कुत्सित बर्ताव कर सकती हूँ।' मोहिनी इस तरह नाना प्रकारके विचार करके पुत्रसे बोली—'तुम मेरे पतिको शीघ्र बुला लाओ, मैं उनके बिना दो घड़ी भी नहीं रह सकती।' तब उसने तुरंत ही पिताके पास जा उन्हें प्रणाम करके कहा—'तात! मेरी छोटी माँ आपका शीघ्र दर्शन करना चाहती है।' पुत्रकी यह बात सुनकर


* किं जातैर्बहुभिः पुत्रैः शोकसंतापकारकैः। वरमेकः कुलालम्बी यत्र विश्रमते कुलम्॥
(ना० उत्तर० १७। १०)