संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context६२२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
पतिकी यह बात सुनकर शूद्रपत्नी उससे बोली— 'नाथ! पूर्वजन्मके किये हुए पाप ही दुःखरूपमें प्रकट होते हैं। जो विवेकी पुरुष उन दुःखोंको धैर्यपूर्वक सहन करता है, उसे मनुष्योंमें श्रेष्ठ समझना चाहिये।' ऐसा कहकर उसने स्वामीको धीरज बँधाया। वह सुन्दरी नारी अपने पिता और भाइयोंसे धन माँग लायी। वह अपने पतिको क्षीरशायी भगवान् मानती थी। प्रतिदिन दिनमें और रातमें भी उसकी गुदाके घावको धोकर शुद्ध करती थी। रजनीकर नामक वृक्षका गोंद लेकर उसपर लगाती और नखद्वारा धीरे-धीरे स्वामीके कोढ़से कीड़ोंको नीचे गिराती थी। फिर मोरपंखका व्यजन लेकर उनके लिये हवा करती थी। माँ! वह श्रेष्ठ नारी न रातमें सोती थी, न दिनमें। थोड़े दिनोंके बाद उसके पतिको त्रिदोष हो गया। अब वह बड़े यत्नसे सोंठ, मिर्च और पीपल अपने स्वामीको पिलाने लगी। एक दिन सर्दीसे पीड़ित हो काँपते हुए पतिने पत्नीकी अँगुली काट ली। उस समय सहसा उसके दोनों दाँत आपसमें सट गये और वह कटी हुई अँगुली उसके मुँहके भीतर ही रह गयी। महारानी! उसी दशामें उसकी मृत्यु हो गयी। अब वह अपना कंगन बेचकर काठ खरीद लायी और उसकी चिता तैयार की। चितापर उसने घी छिड़क दिया और बीचमें पतिको सुलाकर स्वयं भी उसपर चढ़ गयी। वह सुन्दर अङ्गोंवाली सती प्रज्वलित अग्निमें देहका परित्याग करके पतिको साथ ले सहसा देवलोकको चली गयी। उसने, जिसका साधन कठिन है, ऐसे दुष्कर कर्मद्वारा बहुत-सी पापराशियोंको शुद्ध कर दिया था।'
भार्याका अहंकारवश अनादर करता है, वह पंद्रह जन्मोंतक उस पापके अशुभ फलको भोगता है।'