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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 617 of 770

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Page 617

* उत्तरभाग * ६१५

आयी। किसी प्रकारकी चोट क्यों न हो, सबमें शीतल जलसे सींचना उत्तम माना गया है अथवा भीगे हुए वस्त्रसे सहसा उसपर पट्टी बाँधना हितकर माना गया है। राजन्! जब छिपकली सचेत हुई तो राजाको सामने खड़े देख वेदनासे पीड़ित हो धीरे-धीरे इस प्रकार (मनुष्यकी बोलीमें) बोली—'महाबाहु रुक्माङ्गद! मेरा पूर्वजन्मका चरित्र सुनिये। रमणीय शाकल नगरमें मैं एक ब्राह्मणकी पत्नी थी। प्रभो! मुझमें रूप था, जवानी थी तो भी मैं अपने स्वामीकी अत्यन्त प्यारी न हो सकी। वे सदा मुझसे द्वेष रखते और मेरे प्रति कठोरतापूर्ण बातें कहते थे। महाराज! तब मैंने क्रोधयुक्त हो वशीकरण औषध प्राप्त करनेके लिये ऐसी स्त्रियोंसे सलाह ली, जिन्हें उनके पतियोंने कभी त्याग दिया था (और फिर वे उनके वशमें हो गये थे)। भूपाल! मेरे पूछनेपर उन स्त्रियोंने कहा—'तुम्हारे पति अवश्य वशमें हो जायँगे। उसका एक उपाय है। यहाँ एक संन्यासिनी रहती हैं, उन्हींकी दी हुई दवाओंसे हमारे पति वशमें हुए थे। वरारोहे! तुम भी उन्हीं संन्यासिनीजीसे पूछो। वे तुम्हें कोई अच्छी दवा दे देंगी। तुम उनपर संदेह न करना।' राजन्! तब उन स्त्रियोंके कहनेसे मैं तुरंत वहाँ उनके पास पहुँची और उनसे चूर्ण और रक्षासूत्र लेकर अपने पतिके पास लौट आयी और प्रदोषकालमें दूधके साथ वह चूर्ण स्वामीको पिला दिया। साथ ही रक्षासूत्र उनके गलेमें बाँध दिया। नृपश्रेष्ठ! जिस दिन स्वामीने वह चूर्ण पीया उसी दिनसे उन्हें क्षयका रोग हो गया और वे प्रतिदिन दुबले होने लगे। उनके गुप्त अङ्गमें घाव हो जानेसे उसमें दूषित व्रणजनित कीड़े पड़ गये। कुछ ही दिन बीतनेपर मेरे स्वामी तेजोहीन हो गये। उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं। वे दिन-रात क्रन्दन करते हुए मुझसे बार-बार कहने लगे—'सुन्दरी! मैं तुम्हारा दास हूँ। तुम्हारी शरणमें आया हूँ, अब कभी परायी स्त्रीके पास नहीं जाऊँगा। मेरी रक्षा करो।' महीपते! उनका वह रोदन सुनकर मैं उन तापसीके पास गयी और पूछा—'मेरे पति किस प्रकार सुखी होंगे?' अब उन्होंने उनके दाहकी शान्तिके लिये दूसरी दवा दी। उस दवाको पिला देनेपर मेरे पति तत्काल स्वस्थ हो गये। तबसे मेरे स्वामी मेरे अधीन हो गये और मेरे कथनानुसार चलने लगे। तदनन्तर कुछ कालके बाद मेरी मृत्यु हो गयी और मैं नरक-यातनामें पड़ी। मुझे ताँबेके भाड़में रखकर पंद्रह युगोंतक जलाया गया। जब थोड़ा-सा पातक शेष रह गया तो मैं इस पृथ्वीपर उतारी गयी और यमराजने मेरा छिपकलीका रूप बना दिया। राजन्! उस रूपमें यहाँ रहते हुए मुझे दस हजार वर्ष बीत गये।

'भूपाल! यदि कोई दूसरी युवती भी पतिके लिये वशीकरणका प्रयोग करती है तो उसके सारे धर्म व्यर्थ हो जाते हैं और वह दुराचारिणी स्त्री ताँबेके भाड़में जलायी जाती है। पति ही नारीका रक्षक है, पति ही गति है तथा पति ही देवता और गुरु है। जो उसके ऊपर वशीकरणका