संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 618 of 770
Read in context६१६ * संक्षिप्त नारदपुराण *
प्रयोग करेगी, वह कैसे सुख पा सकती है? वह तो सैकड़ों बार पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेती और अन्तमें गलित कोढ़के रोगसे युक्त स्त्री होती है। अतः महाराज! स्त्रियोंको सदा अपने स्वामीके आदेशका पालन करना चाहिये*। राजन्! आज मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। यदि आप विजया द्वादशीजनित पुण्य देकर मेरा उद्धार नहीं करेंगे तो मैं फिर पातकयुक्त कुत्सित योनिमें ही पड़ जाऊँगी। आपने जो सरयू और गङ्गाके पापनाशक एवं पुण्यमय संगम-तीर्थमें श्रवण नक्षत्रयुक्त द्वादशीका व्रत किया है, वह पुण्यमयी तिथि प्रेतयोनिसे छुड़ानेवाली तथा मनोवाञ्छित फल देनेवाली है। भूपाल! उस तिथिको जो मनुष्य घरमें रहकर भी भगवान् श्रीहरिका स्मरण करते हैं, उन्हें भगवान् सब तीर्थोंके फलकी प्राप्ति करा देते हैं। भूपते! विजयाके दिन जो दान, जप, होम और देवाराधन आदि किया जाता है, वह सब अक्षय होता है, जिसका ऐसा उत्कृष्ट फल है, उसीका पुण्य मुझे दीजिये। द्वादशीको उपवास करके त्रयोदशीको पारण करनेपर मनुष्य उस एक उपवासके बदले बारह वर्षोंके उपवासका फल पाता है। महीपाल! आप इस पृथ्वीपर धर्मके साक्षात् स्वरूप तथा यमराजके मार्गका विध्वंस करनेवाले हैं; दया करके मुझ दुखियाका उद्धार कीजिये।'
छिपकलीकी बात सुनकर मोहिनी बोली—'प्रभो! मनुष्य अपने ही कियेका सुख और दुःखरूप फल भोगता है; अतः स्वामीके प्रति दुष्ट भाव रखनेवाली इस पापिनीसे अपना क्या प्रयोजन है, जिसने रक्षासूत्र और चूर्ण आदिके द्वारा पतिको वशमें कर रखा था। इस पापिनीको छोड़िये, अब हम दोनों नगरकी ओर चलें। जो दूसरे लोगोंके व्यापारमें फँसते हैं, उनका अपना सुख नष्ट होता है।'
रुक्माङ्गदने कहा—ब्रह्मपुत्री! तुमने ऐसी बात कैसे कही? सुमुखि! साधुपुरुषोंका बर्ताव ऐसा नहीं होता है। जो पापी और दूसरोंको सतानेवाले होते हैं, वे ही केवल अपने सुखका ध्यान रखते हैं। सूर्य, चन्द्रमा, मेघ, पृथ्वी, अग्नि, जल, चन्दन, वृक्ष और संतपुरुष परोपकार करनेवाले ही होते हैं। वरानने! सुना जाता है कि पहले राजा हरिश्चन्द्र हुए थे, जिन्हें (सत्यरक्षाके लिये) स्त्री और पुत्रको बेचकर चाण्डालके घरमें रहना पड़ा। वे एक दुःखसे दूसरे भारी दुःखमें फँसते चले गये, परंतु सत्यसे विचलित नहीं हुए। उनके सत्यसे संतुष्ट होकर इन्द्र आदि देवताओंने महाराज हरिश्चन्द्रको इच्छानुसार वर माँगनेके लिये प्रेरित किया; तब उन सत्यपरायण नरेशने ब्रह्मा आदि देवताओंसे कहा—देवगण! यदि आप संतुष्ट हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो यह वर दीजिये—'यह सारी अयोध्यापुरी बाल, वृद्ध, तरुण, स्त्री, पशु, कीट-पतंग और वृक्ष आदिके साथ पापयुक्त होनेपर भी स्वर्गलोकमें चली जाय और अयोध्याभरका पाप केवल मैं लेकर निश्चितरूपसे नरकमें जाऊँ। देवेश्वरो! इन सब लोगोंको पृथ्वीपर छोड़कर मैं अकेला स्वर्गमें नहीं जाऊँगा। यह मैंने सच्ची बात बतायी है।' उनकी यह दृढ़ता जानकर इन्द्र आदि देवताओंने आज्ञा दे दी और उन्हींके साथ वह सारी पुरी स्वर्गलोगमें चली गयी। देवि! महर्षि दधीचिने देवताओंको दैत्योंसे परास्त हुआ सुनकर दयावश उनके उपकारके लिये अपने शरीरकी हड्डियाँतक दे दीं। सुन्दरी!
* यान्यापि युवतिर्भूप भर्तुर्वश्यं समाचरेत्। वृथाधर्मा दुराचारा दह्यते ताम्रभ्राष्ट्रके ॥
भर्ता नाथो गतिर्भर्ता दैवतं गुरुरेव च। तस्य वश्यं चरेद्या तु सा कथं सुखमाप्नुयात् ॥
तिर्यग्योनिशतं याति कृमिकुष्ठसमन्विता। तस्माद्भूपाल कर्तव्यं स्त्रीभिर्भर्तुर्वचः सदा ॥
(ना० उत्तर० १४। ३९-४२)